महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2396, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गङ्गाजीमें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते पुरुषश्रेष्ठाः समाजग्मुः परस्परम्।
विगतक्रोधमात्सर्याः सर्वे विगतकल्मषाः॥ १॥
विधिं परममास्थाय ब्रह्मर्षिविहितं शुभम्।
संहृष्टमनसः सर्वे देवलोक इवामराः॥ २॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**क्रोध और मात्सर्यसे रहित तथा पापशून्य हुए वे सभी श्रेष्ठ पुरुष ब्रह्मर्षियोंकी बनायी हुई उत्तम प्रणालीका आश्रय ले एक-दूसरेसे प्रेमपूर्वक मिले। उस समय देवलोकमें रहनेवाले देवताओंकी भाँति उन सबके मनमें हर्षोल्लास छा रहा था॥ १-२॥
पुत्रः पित्रा च मात्रा च
भार्याश्च पतिभिः सह।
भ्रात्रा भ्राता सखा चैव
सख्या राजन् समागताः॥ ३॥
राजन्! पुत्र पिता-माताके साथ, स्त्री पतिके साथ, भाई भाईके साथ और मित्र मित्रके साथ मिले॥ ३॥
पाण्डवास्तु महेष्वासं कर्णं सौभद्रमेव च।
सम्प्रहर्षात् समाजग्मुर्द्रौपदेयांश्च सर्वशः॥ ४॥
पाण्डव महाधनुर्धर कर्ण, सुभद्राकुमार अभिमन्यु और द्रौपदीके पाँचों पुत्र—इन सबके साथ अत्यन्त हर्षपूर्वक मिले॥ ४॥
ततस्ते प्रीयमाणा वै कर्णेन सह पाण्डवाः।
समेत्य पृथिवीपाल सौहृद्ये च स्थिता भवन्॥ ५॥
भूपाल! तत्पश्चात् सब पाण्डवोंने कर्णसे प्रसन्नता-पूर्वक मिलकर उनके साथ सौहार्दपूर्ण बर्ताव किया॥ ५॥
परस्परं समागम्य योधास्ते भरतर्षभ।