महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमुनेः प्रसादात् ते ह्येवं क्षत्रिया नष्टमन्यवः ।। ६ ।।
असौहृदं परित्यज्य सौहृदे पर्यवस्थिताः ।
भरतभूषण! वे समस्त योद्धा एक-दूसरेसे मिलकर बड़े प्रसन्न हुए। इस प्रकार मुनिकी कृपासे वे सभी क्षत्रिय अपने क्रोधको भुलाकर शत्रुभाव छोड़कर परस्पर सौहार्द स्थापित करके मिले ।। ६ १/२ ।।
एवं समागताः सर्वे गुरुभिर्बान्धवैः सह ।। ७ ।।
पुत्रैश्च पुरुषव्याघ्राः कुरवोऽन्ये च पार्थिवाः ।
इस तरह वे सब पुरुषसिंह कौरव तथा अन्य नरेश गुरुजनों, बान्धवों और पुत्रोंके साथ मिले ।। ७ १/२ ।।
तां रात्रिमखिलामेवं विहृत्य प्रीतमानसाः ।। ८ ।।
मेनिरे परितोषेण नृपाः स्वर्गसदो यथा ।
सारी रात एक-दूसरेके साथ घूमने-फिरनेके कारण उन सबके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी। स्वर्गवासियोंके समान ही उन्हें वहाँ परम संतोषका अनुभव हुआ ।। ८ १/२ ।।
नात्र शोको भयं त्रासो नार्तिर्नायशोऽभवत् ।। ९ ।।
परस्परं समागम्य योधानां भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! एक-दूसरेसे मिलकर उन योद्धाओंके मनमें शोक, भय, त्रास, उद्वेग और अपयशको स्थान नहीं मिला ।।
समागतास्ताः पितृभिर्भ्रातृभिः पतिभिः सुतैः ।। १० ।।
मुदं परमिकां प्राप्य नार्यो दुःखमथात्यजन् ।
वहाँ आयी हुई स्त्रियाँ अपने पिताओं, भाइयों, पतियों और पुत्रोंसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुईं। उनका सारा दुःख दूर हो गया ।। १० १/२ ।।
एकां रात्रिं विहृत्यैव ते वीरास्ताश्च योषितः ।। ११ ।।
आमन्त्र्यान्योन्यमाश्लिष्य ततो जग्मुर्यथागतम् ।
वे वीर और उनकी वे तरुणी स्त्रियाँ एक रात साथ-साथ विहार करके अन्तमें एक-दूसरेकी अनुमति ले परस्पर गले मिलकर जैसे आये थे, उसी प्रकार चले जानेको उद्यत हुए ।। ११ १/२ ।।
ततो विसर्जयामास लोकांस्तान् मुनिपुङ्गवः ।। १२ ।।
क्षणेनान्तर्हिताश्चैव प्रेक्षतामेव तेऽभवन् ।
अवगाह्य महात्मानः पुण्यां भागीरथीं नदीम् ।। १३ ।।
सरथाः सध्वजाश्चैव स्वानि वेश्मानि भेजिरे ।