भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1137, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1137

कुछ भूतोंकी आकृति सिंहों, व्याघ्रों एवं गजराजोंके समान थी। उनमें सभी जातियोंके

प्राणी सम्मिलित थे। कितने ही भूतोंके मुख सियारों, चीतों, रीछों और बैलोंके समान

थे ॥ ५ ॥

उलूकवदनैर्भीमैर्वृकश्येनमुखैस्तथा ।

नानावर्णैर्मृगमुखैः सर्वजातिसमन्वितैः ॥ ६ ॥

कितने ही उल्लू-जैसे मुखवाले थे। बहुत-से भयंकर भूत भेड़ियों और बाजोंके समान

मुख धारण करते थे। और कितनोंके मुख हरिणोंके समान थे। उन सबके वर्ण अनेक

प्रकारके थे तथा वे सभी जातियोंसे सम्पन्न थे ॥ ६ ॥

किंनरैर्यक्षगन्धर्वै रक्षोभूतगणैस्तथा ।

दिव्यपुष्पसमाकीर्णं दिव्यज्वालासमाकुलम् ॥ ७ ॥

दिव्यचन्दनसंयुक्तं दिव्यधूपेन धूपितम् ।

तत् सदो वृषभाङ्कस्य दिव्यवादित्रनादितम् ॥ ८ ॥

मृदङ्गपणवोद्घुष्टं शङ्खभेरीनिनादितम् ।

नृत्यद्भिर्भूतसंघैश्च बर्हिणैश्च समन्ततः ॥ ९ ॥

इनके सिवा बहुत-से किन्नरों, यक्षों, गन्धर्वों, राक्षसों तथा भूतगणोंने भी महादेवजीको

घेर रखा था। भगवान् शंकरकी वह सभा दिव्य पुष्पोंसे आच्छादित, दिव्य तेजसे व्याप्त,

दिव्य चन्दनसे चर्चित और दिव्य धूपकी सुगन्धसे सुवासित थी। वहाँ दिव्य वाद्योंकी ध्वनि

गूँजती रहती थी। मृदंग और पणवका घोष छाया रहता था। शंख और भेरियोंके नाद सब

ओर व्याप्त हो रहे थे। चारों ओर नाचते हुए भूतसमुदाय और मयूर उसकी शोभा बढ़ाते

थे ॥ ७–९ ॥

प्रनृत्ताप्सरसं दिव्यं देवर्षिगणसेवितम् ।

दृष्टिकान्तमनिर्देश्यं दिव्यमद्भुतदर्शनम् ॥ १० ॥

वहाँ अप्सराएँ नृत्य करती थीं, वह दिव्य सभा देवर्षियोंके समुदायोंसे शोभित, देखनेमें

मनोहर, अनिर्वचनीय, अलौकिक और अद्भुत थी ॥ १० ॥

स गिरिस्तपसा तस्य गिरिशस्य व्यरोचत ।

स्वाध्यायपरमैर्विप्रैर्ब्रह्मघोषो निनादितः ॥ ११ ॥

भगवान् शंकरकी तपस्यासे उस पर्वतकी बड़ी शोभा हो रही थी। स्वाध्यायपरायण

ब्राह्मणोंकी वेद-ध्वनि वहाँ सब ओर गूँज रही थी ॥ ११ ॥

षट्पदैरुपगीतैश्च माधवाप्रतिमो गिरिः ।

तन्महोत्सवसंकाशं भीमरूपधरं ततः ॥ १२ ॥

दृष्ट्वा मुनिगणस्यासीत् परा प्रीतिर्जनार्दन ।

माधव! वह अनुपम पर्वत भ्रमरोंके गीतोंसे अत्यन्त सुशोभित हो रहा था। जनार्दन! वह

स्थान अत्यन्त भयंकर होनेपर भी महान् उत्सवसे सम्पन्न-सा प्रतीत होता था। उसे देखकर

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