भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1138, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1138

मुनियोंके समुदायको बड़ी प्रसन्नता हुई ।। मुनयश्च महाभागाः सिद्धाश्चैवोर्ध्वरेतसः ।। १३ ।। मरुतो वसवः साध्या विश्वेदेवाः सवासवाः । यक्षा नागाः पिशाचाश्च लोकपाला हुताशनाः ।। १४ ।। वाताः सर्वे महाभूतास्तत्रैवासन् समागताः । महान् सौभाग्यशाली मुनि, ऊर्ध्वरेता सिद्धगण, मरुद्गण, वसुगण, साध्यगण, इन्द्रसहित विश्वेदेवगण, यक्ष और नाग, पिशाच, लोकपाल, अग्नि, समस्त वायु और प्रधान भूतगण वहाँ आये हुए थे ।। १३-१४ १/२ ।। ऋतवः सर्वपुष्पैश्च व्यकिरन्त महाद्भुतैः ।। १५ ।। ओषध्यो ज्वलमानाश्च द्योतयन्ति स्म तद् वनम् । ऋतुएँ वहाँ उपस्थित हो सब प्रकारके अत्यन्त अद्भुत पुष्प बिखेर रही थीं। ओषधियाँ प्रज्वलित हो उस वनको प्रकाशित कर रही थीं ।। १५ १/२ ।। विहङ्गाश्च मुदा युक्ताः प्रानृत्यन् व्यनदंश्च ह ।। १६ ।। गिरिपृष्ठेषु रम्येषु व्याहरन्तो जनप्रियाः । वहाँके रमणीय पर्वतशिखरोंपर लोगोंको प्रिय लगनेवाली बोली बोलते हुए पक्षी प्रसन्नतासे युक्त हो नाचते और कलरव करते थे ।। १६ १/२ ।। तत्र देवो गिरितटे दिव्यधातुविभूषिते ।। १७ ।। पर्यङ्क इव विभ्राजन्नुपविष्टो महामनाः । दिव्य धातुओंसे विभूषित पर्यंकके समान उस पर्वतशिखरपर बैठे हुए महामना महादेवजी बड़ी शोभा पा रहे थे ।। १७ १/२ ।। व्याघ्रचर्माम्बरधरः सिंहचर्मोत्तरच्छदः ।। १८ ।। व्यालयज्ञोपवीती च लोहिताङ्गदभूषणः । हरिश्मश्रुर्जटी भीमो भयकर्ता सुरद्विषाम् ।। १९ ।। अभयः सर्वभूतानां भक्तानां वृषभध्वजः । उन्होंने व्याघ्रचर्मको ही वस्त्रके रूपमें धारण कर रखा था। सिंहका चर्म उनके लिये उत्तरीय वस्त्र (चादर)का काम देता था। उनके गलेमें सर्पमय यज्ञोपवीत शोभा दे रहा था। वे लाल रंगके बाजूबंदसे विभूषित थे। उनकी मूँछ काली थी, मस्तकपर जटाजूट शोभा पाता था। वे भीमस्वरूप रुद्र देवद्रोहियोंके मनमें भय उत्पन्न करते थे। अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण करनेवाले वे भगवान् शिव भक्तों तथा सम्पूर्ण भूतोंके भयका निवारण करते थे ।। १८-१९ १/२ ।। दृष्ट्वा महर्षयः सर्वे शिरोभिरवनिं गताः ।। २० ।। (गीर्भिः परमशुद्धाभिस्तुष्टुवुश्च मनोहरम् ।।)