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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1139, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1139

विमुक्ताः सर्वपापेभ्यः क्षान्ता विगतकल्मषाः । भगवान् शंकरका दर्शन करके उन सभी महर्षियोंने पृथ्वीपर सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया और परम शुद्ध वाणीद्वारा उनकी मनोहर स्तुति की। वे सभी ऋषि सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त, क्षमाशील और कल्मषरहित थे ॥ तस्य भूतपतेः स्थानं भीमरूपधरं बभौ ॥ २१ ॥ अप्रधृष्यतरं चैव महोरगसमाकुलम् । भगवान् भूतनाथका वह भयानक स्थान बड़ी शोभा पा रहा था। वह अत्यन्त दुर्धर्ष और बड़े-बड़े सर्पोंसे भरा हुआ था ॥ २१ १/२ ॥ क्षणेनैवाभवत् सर्वमद्भुतं मधुसूदन ॥ २२ ॥ तत् सदो वृषभाङ्कस्य भीमरूपधरं बभौ । मधुसूदन! वृषभध्वजका वह भयानक सभास्थल क्षणभरमें अद्भुत शोभा पाने लगा ॥ २२ १/२ ॥ तमभ्ययाच्छैलसुता भूतस्त्रीगणसंवृता ॥ २३ ॥ हरतुल्याम्बरधरा समानव्रतधारिणी । बिभ्रती कलशं रौक्मं सर्वतीर्थजलोद्भवम् ॥ २४ ॥ उस समय भूतोंकी स्त्रियोंसे घिरी हुई गिरिराज-नन्दिनी उमा सम्पूर्ण तीर्थोंके जलसे भरा हुआ सोनेका कलश लिये उनके पास आयीं। उन्होंने भी भगवान् शंकरके समान ही वस्त्र धारण किया था। वे भी उन्हींकी भाँति उत्तम व्रतका पालन करती थीं ॥ २३-२४ ॥ गिरिस्रवाभिः सर्वाभिः पृष्ठतोऽनुगता शुभा । पुष्पवृष्ट्याभिवर्षन्ती गन्धैर्बहुविधैस्तथा । सेवन्ती हिमवत् पार्श्वं हरपार्श्वमुपागमत् ॥ २५ ॥ उनके पीछे-पीछे उस पर्वतसे गिरनेवाली सभी नदियाँ चल रही थीं। शुभलक्षणा पार्वती फूलोंकी वर्षा करती और नाना प्रकारकी सुगन्ध बिखेरती हुई भगवान् शिवके पास आयीं। वे भी हिमालयके पार्श्वभागका ही सेवन करती थीं ॥ २५ ॥ ततः स्मयन्ती पाणिभ्यां नर्मार्थं चारुहासिनी । हरनेत्रे शुभे देवी सहसा सा समावृणोत् ॥ २६ ॥ आते ही मनोहर हास्यवाली देवी उमाने मनोरंजन या हास-परिहासके लिये मुसकराकर अपने दोनों हाथोंसे सहसा भगवान् शंकरके दोनों नेत्र बंद कर लिये ॥ संवृताभ्यां तु नेत्राभ्यां तमोभूतमचेतनम् । निर्गोमं निर्वषट्कारं जगद् वै सहसाभवत् ॥ २७ ॥ उनके दोनों नेत्रोंके आच्छादित होते ही सारा जगत् सहसा अन्धकारमय, चेतनाशून्य तथा होम और वषट्कारसे रहित हो गया ॥ २७ ॥ जनश्च विमनाः सर्वोऽभवत् त्राससमन्वितः ।

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