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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

विमुक्ताः सर्वपापेभ्यः क्षान्ता विगतकल्मषाः । भगवान् शंकरका दर्शन करके उन सभी महर्षियोंने पृथ्वीपर सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया और परम शुद्ध वाणीद्वारा उनकी मनोहर स्तुति की। वे सभी ऋषि सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त, क्षमाशील और कल्मषरहित थे ॥ तस्य भूतपतेः स्थानं भीमरूपधरं बभौ ॥ २१ ॥ अप्रधृष्यतरं चैव महोरगसमाकुलम् । भगवान् भूतनाथका वह भयानक स्थान बड़ी शोभा पा रहा था। वह अत्यन्त दुर्धर्ष और बड़े-बड़े सर्पोंसे भरा हुआ था ॥ २१ १/२ ॥ क्षणेनैवाभवत् सर्वमद्भुतं मधुसूदन ॥ २२ ॥ तत् सदो वृषभाङ्कस्य भीमरूपधरं बभौ । मधुसूदन! वृषभध्वजका वह भयानक सभास्थल क्षणभरमें अद्भुत शोभा पाने लगा ॥ २२ १/२ ॥ तमभ्ययाच्छैलसुता भूतस्त्रीगणसंवृता ॥ २३ ॥ हरतुल्याम्बरधरा समानव्रतधारिणी । बिभ्रती कलशं रौक्मं सर्वतीर्थजलोद्भवम् ॥ २४ ॥ उस समय भूतोंकी स्त्रियोंसे घिरी हुई गिरिराज-नन्दिनी उमा सम्पूर्ण तीर्थोंके जलसे भरा हुआ सोनेका कलश लिये उनके पास आयीं। उन्होंने भी भगवान् शंकरके समान ही वस्त्र धारण किया था। वे भी उन्हींकी भाँति उत्तम व्रतका पालन करती थीं ॥ २३-२४ ॥ गिरिस्रवाभिः सर्वाभिः पृष्ठतोऽनुगता शुभा । पुष्पवृष्ट्याभिवर्षन्ती गन्धैर्बहुविधैस्तथा । सेवन्ती हिमवत् पार्श्वं हरपार्श्वमुपागमत् ॥ २५ ॥ उनके पीछे-पीछे उस पर्वतसे गिरनेवाली सभी नदियाँ चल रही थीं। शुभलक्षणा पार्वती फूलोंकी वर्षा करती और नाना प्रकारकी सुगन्ध बिखेरती हुई भगवान् शिवके पास आयीं। वे भी हिमालयके पार्श्वभागका ही सेवन करती थीं ॥ २५ ॥ ततः स्मयन्ती पाणिभ्यां नर्मार्थं चारुहासिनी । हरनेत्रे शुभे देवी सहसा सा समावृणोत् ॥ २६ ॥ आते ही मनोहर हास्यवाली देवी उमाने मनोरंजन या हास-परिहासके लिये मुसकराकर अपने दोनों हाथोंसे सहसा भगवान् शंकरके दोनों नेत्र बंद कर लिये ॥ संवृताभ्यां तु नेत्राभ्यां तमोभूतमचेतनम् । निर्गोमं निर्वषट्कारं जगद् वै सहसाभवत् ॥ २७ ॥ उनके दोनों नेत्रोंके आच्छादित होते ही सारा जगत् सहसा अन्धकारमय, चेतनाशून्य तथा होम और वषट्कारसे रहित हो गया ॥ २७ ॥ जनश्च विमनाः सर्वोऽभवत् त्राससमन्वितः ।

निमीलिते भूतपतौ नष्टसूर्य इवाभवत् ॥ २८ ॥
सब लोग अनमने हो गये, सबके ऊपर त्रास छा गया। भूतनाथके नेत्र बंद कर लेनेपर इस संसारकी वैसी ही दशा हो गयी, मानो सूर्यदेव नष्ट हो गये हैं ॥ २८ ॥
ततो वितिमिरो लोकः क्षणेन समपद्यत ।
ज्वाला च महती दीप्ता ललाटात् तस्य निःसृता ॥ २९ ॥
तदनन्तर क्षणभरमें सारे जगत्‌का अन्धकार दूर हो गया। भगवान् शिवके ललाटसे अत्यन्त दीप्तिशालिनी महाज्वाला प्रकट हो गयी ॥ २९ ॥
तृतीयं चास्य सम्भूतं नेत्रमादित्यसंनिभम् ।
युगान्तसदृशं दीप्तं येनासौ मथितो गिरिः ॥ ३० ॥
उनके ललाटमें आदित्यके समान तेजस्वी तीसरे नेत्रका आविर्भाव हो गया। वह नेत्र प्रलयाग्निके समान देदीप्यमान हो रहा था। उस नेत्रसे प्रकट हुई ज्वालाने उस पर्वतको जलाकर मथ डाला ॥ ३० ॥
ततो गिरिसुता दृष्ट्वा दीप्ताग्निसदृशेक्षणम् ।
हरं प्रणम्य शिरसा ददर्शायतलोचना ॥ ३१ ॥
तब महादेवजीको प्रज्वलित अग्निके सदृश तीसरे नेत्रसे युक्त हुआ देख गिरिराजनन्दिनी विशाललोचना उमाने सिरसे प्रणाम करके उनकी ओर चकित दृष्टिसे देखा ॥ ३१ ॥
दह्यमाने वने तस्मिन् ससालसरलद्रुमे ।
सचन्दनवरे रम्ये दिव्यौषधिविदीपिते ॥ ३२ ॥
साल और सरल आदि वृक्षोंसे युक्त, श्रेष्ठ चन्दन-वृक्षसे सुशोभित तथा दिव्य ओषधियोंसे प्रकाशित उस रमणीय वनमें आग लग गयी थी और वह सब ओरसे जल रहा था ॥ ३२ ॥
मृगयूथैर्द्रुतैर्भीतैर्हरपार्श्वमुपागतैः ।
शरणं चाप्यविन्दद्भिस्तत् सदः संकुलं बभौ ॥ ३३ ॥
भयभीत मृगोंके झुंडोंको जब कहीं भी शरण न मिली, तब वे भागते हुए महादेवजीके पास आ पहुँचे। उनसे वह सारा सभास्थल भर गया और उसकी अपूर्व शोभा होने लगी ॥ ३३ ॥
ततो नभस्पृग्ज्वालो विद्युल्लोलाग्निरुल्बणः ।
द्वादशादित्यसदृशो युगान्ताग्निरिवापरः ॥ ३४ ॥
वहाँ लगी हुई आगकी लपटें आकाशको चूम रही थीं। विद्युत्‌के समान चंचल हुई वह आग बड़ी भयानक प्रतीत हो रही थी, वह बारह सूर्योंके समान प्रकाशित होकर दूसरी प्रलयाग्निके समान प्रतीत होती थी ॥ ३४ ॥
क्षणेन तेन निर्दग्धो हिमवान्भवन्नगः ।

सधातुशिखराभोगो दीप्तदग्धलतौषधिः ॥ ३५ ॥
उसने क्षणभरमें हिमालय पर्वतको धातु और विशाल शिखरोंसहित दग्ध कर डाला। उसकी लताएँ और ओषधियाँ प्रज्वलित हो जलकर भस्म हो गयीं ॥
तं दृष्ट्वा मथितं शैलं शैलराजसुता ततः ।
भगवन्तं प्रपन्ना वै साञ्जलिप्रग्रहा स्थिता ॥ ३६ ॥
उस पर्वतको दग्ध हुआ देख गिरिराजकुमारी उमा दोनों हाथ जोड़कर भगवान् शंकरकी शरणमें गयीं ॥ ३६ ॥
उमां शर्वस्तदा दृष्ट्वा स्त्रीभावगतमार्दवाम् ।
पितुर्दैन्यमनिच्छन्तीं प्रीत्यापश्यत् तदा गिरिम् ॥ ३७ ॥
उस समय उमामें नारी-स्वभाववश मृदुता (कातरता) आ गयी थी। वे पिताकी दयनीय अवस्था नहीं देखना चाहती थीं। उनकी ऐसी दशा देख भगवान् शंकरने हिमवान् पर्वतकी ओर प्रसन्नतापूर्ण दृष्टिसे देखा ॥ ३७ ॥
क्षणेन हिमवान् सर्वः प्रकृतिस्थः सुदर्शनः ।
प्रहृष्टविहगश्चैव सुपुष्पितवनद्रुमः ॥ ३८ ॥
उनकी दृष्टि पड़नेपर क्षणभरमें सारा हिमालय पर्वत पहली स्थितिमें आ गया। देखनेमें परम सुन्दर हो गया। वहाँ हर्षमें भरे हुए पक्षी कलरव करने लगे। उस वनके वृक्ष सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित हो गये ॥ ३८ ॥
प्रकृतिस्थं गिरिं दृष्ट्वा प्रीता देवं महेश्वरम् ।
उवाच सर्वलोकानां पतिं शिवमनिन्दिता ॥ ३९ ॥
पर्वतको पूर्वावस्थामें स्थित हुआ देख पतिव्रता पार्वती देवी बहुत प्रसन्न हुईं। फिर उन्होंने सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी कल्याणस्वरूप महेश्वरदेवसे पूछा ॥ ३९ ॥

उमोवाच

भगवन् सर्वभूतेश शूलपाणे महाव्रत ।
संशयो मे महान् जातस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४० ॥
उमा बोलीं— भगवन्! सर्वभूतेश्वर! शूलपाणे! महान् व्रतधारी महेश्वर! मेरे मनमें एक महान् संशय उत्पन्न हुआ है। आप मुझसे उसकी व्याख्या कीजिये ॥
किमर्थं ते ललाटे वै तृतीयं नेत्रमुत्थितम् ।
किमर्थं च गिरिर्दग्धः सपक्षिगणकाननः ॥ ४१ ॥
किमर्थं च पुनर्देव प्रकृतिस्थस्त्वया कृतः ।
तथैव द्रुमसंच्छन्नः कृतोऽयं ते पिता मम ॥ ४२ ॥
क्यों आपके ललाटमें तीसरा नेत्र प्रकट हुआ? किसलिये आपने पक्षियों और वनोंसहित पर्वतको दग्ध किया और देव! फिर किसलिये आपने उसे पूर्वावस्थामें ला दिया।

मेरे इन पिताको आपने जो पूर्ववत् वृक्षोंसे आच्छादित कर दिया, इसका क्या कारण है? ।।
(एष मे संशयो देव हृदि मे सम्प्रवर्तते ।
देवदेव नमस्तुभ्यं तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
देवदेव! मेरे हृदयमें यह संदेह विद्यमान है। आप इसका समाधान करनेकी कृपा करें। आपको मेरा सादर नमस्कार है ।।

नारद उवाच
एवमुक्तस्तथा देव्या प्रीयमाणोऽब्रवीद् भवः ॥)
नारदजी कहते हैं—देवी पार्वतीके ऐसा कहने-पर भगवान् शंकर प्रसन्न होकर बोले ।।

श्रीमहेश्वर उवाच
(स्थाने संशयितुं देवि धर्मज्ञे प्रियभाषिणी ।।
त्वदृते मां हि वै प्रष्टुं न शक्यं केनचित् प्रिये ।
श्रीमहेश्वरने कहा—धर्मको जानने तथा प्रिय वचन बोलनेवाली देवि! तुमने जो संशय उपस्थित किया है, वह उचित ही है। प्रिये! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मुझसे ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता ।।
प्रकाशं यदि वा गुह्यं प्रियार्थं प्रब्रवीम्यहम् ।।
शृणु तत् सर्वमखिलमस्यां संसदि भामिनी ।
भामिनि! प्रकट या गुप्त जो भी बात होगी, तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैं सब कुछ बताऊँगा। तुम इस सभामें मुझसे सारी बातें सुनो ।।
सर्वेषामेव लोकानां कूटस्थं विद्धि मां प्रिये ।।
मदधीनास्त्रयो लोका यथा विष्णौ तथा मयि ।
स्रष्टा विष्णुरहं गोप्ता इत्येतद् विद्धि भामिनि ।।
प्रिये! सभी लोकोंमें मुझे कूटस्थ समझो। तीनों लोक मेरे अधीन हैं। ये जैसे भगवान् विष्णुके अधीन हैं, उसी प्रकार मेरे भी अधीन हैं। भामिनि! तुम यही जान लो कि भगवान् विष्णु जगत्के स्रष्टा हैं और मैं इसकी रक्षा करनेवाला हूँ ।।
तस्माद् यदा मां स्पृशति शुभं वा यदि वेतरत् ।
तथैवेदं जगत् सर्वं तत्तद् भवति शोभने ॥)
शोभने! इसीलिये जब मुझसे शुभ या अशुभका स्पर्श होता है, तब यह सारा जगत् वैसा ही शुभ या अशुभ हो जाता है ।।
नेत्रे मे संवृते देवि त्वया बाल्यादनिन्दिते ।
नष्टालोकस्तदा लोकः क्षणेन समपद्यत ॥ ४३ ॥

देवि! अनिन्दिते! तुमने अपने भोलेपनके कारण मेरी दोनों आँखें बंद कर दीं। इससे

क्षणभरमें समस्त संसारका प्रकाश तत्काल नष्ट हो गया ॥ ४३ ॥

नष्टादित्ये तथा लोके तमोभूते नगात्मजे ।

तृतीयं लोचनं दीप्तं सृष्टं मे रक्षता प्रजाः ॥ ४४ ॥

गिरिराजकुमारी! संसारमें जब सूर्य अदृश्य हो गये और सब ओर अन्धकार-ही-

अन्धकार छा गया, तब मैंने प्रजाकी रक्षाके लिये अपने तीसरे तेजस्वी नेत्रकी सृष्टि की

है ॥ ४४ ॥

तस्य चाक्ष्णो महत् तेजो येनायं मथितो गिरिः ।

त्वत्प्रियार्थं च मे देवि प्रकृतिस्थः पुनः कृतः ॥ ४५ ॥

उसी तीसरे नेत्रका यह महान् तेज था, जिसने इस पर्वतको मथ डाला। देवि! फिर

तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैंने इस गिरिराज हिमवान्को पुनः प्रकृतिस्थ कर दिया

है ॥ ४५ ॥

उमोवाच

भगवन् केन ते वक्त्रं चन्द्रवत् प्रियदर्शनम् ।

पूर्वं तथैव श्रीकान्तमुत्तरं पश्चिमं तथा ॥ ४६ ॥

दक्षिणं च मुखं रौद्रं केनोर्ध्वं कपिला जटाः ।

केन कण्ठश्च ते नीलो बर्हिबर्हनिभः कृतः ॥ ४७ ॥

उमाने कहा—भगवन्! (आपके चार मुख क्यों हैं।) आपका पूर्व दिशावाला मुख

चन्द्रमाके समान कान्तिमान् एवं देखनेमें अत्यन्त प्रिय है। उत्तर और पश्चिम दिशाके मुख

भी पूर्वकी ही भाँति कमनीय कान्तिसे युक्त हैं। परंतु दक्षिण दिशावाला मुख बड़ा भयंकर

है। यह अन्तर क्यों? तथा आपके सिरपर कपिल वर्णकी जटाएँ कैसे हुईं? क्या कारण है

कि आपका कण्ठ मोरकी पाँखके समान नीला हो गया? ॥ ४६-४७ ॥

हस्ते देव पिनाकं ते सततं केन तिष्ठति ।

जटिलो ब्रह्मचारी च किमर्थमसि नित्यदा ॥ ४८ ॥

देव! आपके हाथमें पिनाक क्यों सदा विद्यमान रहता है? आप किसलिये नित्य

जटाधारी ब्रह्मचारीके वेशमें रहते हैं? ॥ ४८ ॥

एतन्मे संशयं सर्वं वक्तुमर्हसि वै प्रभो ।

सधर्मचारिणी चाहं भक्ता चेति वृषध्वज ॥ ४९ ॥

प्रभो! वृषध्वज! मेरे इस सारे संशयका समाधान कीजिये; क्योंकि मैं आपकी

सहधर्मिणी और भक्त हूँ ॥ ४९ ॥

भीष्म उवाच

एवमुक्तः स भगवान् शैलपुत्र्या पिनाकधृत् ।

तस्या धृत्या च बुद्ध्या च प्रीतमानभवत् प्रभुः ॥ ५० ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! गिरिराजकुमारी उमाके इस प्रकार पूछनेपर पिनाकधारी भगवान् शिव उनके धैर्य और बुद्धिसे बहुत प्रसन्न हुए ॥ ५० ॥ ततस्तामब्रवीद् देवः सुभगे श्रूयतामिति । हेतुभिर्यैर्ममैतानि रूपाणि रुचिरानने ॥ ५१ ॥ तत्पश्चात् उन्होंने पार्वतीजीसे कहा—'सुभगे! रुचिरानने! जिन हेतुओंसे मेरे ये रूप हुए हैं, उन्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादो नाम चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादनामक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४० ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ५७ १/२ श्लोक हैं)

शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण

श्रीभगवानुवाच

तिलोत्तमा नाम पुरा ब्रह्मणा योषिदुत्तमा ।
तिलं तिलं समुद्धृत्य रत्नानां निर्मिता शुभा ॥ १ ॥
भगवान् शिवने कहा— प्रिये! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने एक सर्वोत्तम नारीकी सृष्टि की थी। उन्होंने सम्पूर्ण रत्नोंका तिल-तिलभर सार उद्धृत करके उस शुभलक्षणा सुन्दरीके अंगोंका निर्माण किया था; इसलिये वह तिलोत्तमा नामसे प्रसिद्ध हुई ॥ १ ॥

साभ्यगच्छत मां देवि रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
प्रदक्षिणं लोभयन्ती मां शुभे रुचिरानना ॥ २ ॥
देवि! शुभे! इस पृथ्वीपर तिलोत्तमाके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। वह सुमुखी बाला मुझे लुभाती हुई मेरी परिक्रमा करनेके लिये आयी ॥ २ ॥

यतो यतः सा सुदती मामुपाधावदन्तिके ।
ततस्ततो मुखं चारु मम देवि विनिर्गतम् ॥ ३ ॥
देवि! वह सुन्दर दाँतोंवाली सुन्दरी निकटसे मेरी परिक्रमा करती हुई जिस-जिस दिशाकी ओर गयी, उस-उस दिशाकी ओर मेरा मनोरम मुख प्रकट होता गया ॥ ३ ॥

तां दिदृक्षुरहं योगाच्चतुर्मूर्तित्वमागतः ।
चतुर्मुखश्च संवृत्तो दर्शयन् योगमुत्तमम् ॥ ४ ॥
तिलोत्तमाके रूपको देखनेकी इच्छासे मैं योगबलसे चतुर्मूर्ति एवं चतुर्मुख हो गया। इस प्रकार मैंने लोगोंको उत्तम योगशक्तिका दर्शन कराया ॥ ४ ॥

पूर्वेण वदनेनाहमिन्द्रत्वमनुशास्मि ह ।
उत्तरेण त्वया सार्धं रमाम्यहमनिन्दिते ॥ ५ ॥
मैं पूर्व दिशावाले मुखके द्वारा इन्द्रपदका अनुशासन करता हूँ। अनिन्दिते! मैं उत्तरवर्ती मुखके द्वारा तुम्हारे साथ वार्तालापके सुखका अनुभव करता हूँ ॥ ५ ॥

पश्चिमं मे मुखं सौम्यं सर्वप्राणिसुखावहम् ।
दक्षिणं भीमसंकाशं रौद्रं संहरति प्रजाः ॥ ६ ॥
मेरा पश्चिमवाला मुख सौम्य है और सम्पूर्ण प्राणियोंको सुख देनेवाला है तथा दक्षिण दिशावाला भयानक मुख रौद्र है, जो समस्त प्रजाका संहार करता है ॥

जटिलो ब्रह्मचारी च लोकानां हितकाम्यया ।

देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं पिनाकं मे करे स्थितम् ॥ ७ ॥
लोगोंके हितकी कामनासे ही मैं जटाधारी ब्रह्मचारीके वेषमें रहता हूँ। देवताओंका हित करनेके लिये पिनाक सदा मेरे हाथमें रहता है ॥ ७ ॥
इन्द्रेण च पुरा वज्रं क्षिप्तं श्रीकाङ्क्षिणा मम ।
दग्ध्वा कण्ठं तु तद् यातं तेन श्रीकण्ठता मम ॥ ८ ॥
पूर्वकालमें इन्द्रने मेरी श्री प्राप्त करनेकी इच्छासे मुझपर वज्रका प्रहार किया था। वह वज्र मेरा कण्ठ दग्ध करके चला गया। इससे मेरी श्रीकण्ठ नामसे ख्याति हुई ॥ ८ ॥
(पुरा युगान्तरे यत्नादमृतार्थं सुरासुरैः ।
बलवद्भिर्विमथितश्चिरकालं महोदधिः ॥
प्राचीन कालके दूसरे युगकी बात है, बलवान् देवताओं और असुरोंने मिलकर अमृतकी प्राप्तिके लिये महान् प्रयास करते हुए चिरकालतक महासागरका मन्थन किया था ॥
रज्जुना नागराजेन मथ्यमाने महोदधौ ।
विषं तत्र समुद्भूतं सर्वलोकविनाशनम् ॥
नागराज वासुकिकी रस्सीसे बँधी हुई मन्दराचलरूपी मथानीद्वारा जब महासागर मथा जाने लगा, तब उससे सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेवाला विष प्रकट हुआ ॥
तद् दृष्ट्वा विबुधाः सर्वे तदा विमनसोऽभवन् ।
ग्रस्तं हि तन्मया देवि लोकानां हितकारणात् ॥
उसे देखकर सब देवताओंका मन उदास हो गया। देवि! तब मैंने तीनों लोकोंके हितके लिये उस विषको स्वयं पी लिया ॥
तत्कृता नीलता चासीत् कण्ठे बर्हिनिभा शुभे ।
तदाप्रभृति चैवाहं नीलकण्ठ इति स्मृतः ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।
शुभे! उस विषके ही कारण मेरे कण्ठमें मोर-पंखके समान नीले रंगका चिह्न बन गया। तभीसे मैं नीलकण्ठ कहा जाने लगा। ये सारी बातें मैंने तुम्हें बता दी। अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥

उमोवाच

नीलकण्ठ नमस्तेऽस्तु सर्वलोकसुखावह ॥
बहूनामायुधानां त्वं पिनाकं धर्तुमिच्छसि ।
किमर्थं देवदेवेश तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा—सम्पूर्ण लोकोंको सुख देनेवाले नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है। देवदेवेश्वर! बहुत-से आयुधोंके होते हुए भी आप पिनाकको ही किसलिये धारण करना चाहते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

शस्त्रागमं ते वक्ष्यामि शृणु धर्म्यं शुचिस्मिते ।
युगान्तरे महादेवि कण्वो नाम महामुनिः ।।
स हि दिव्यां तपश्चर्यां कर्तुमेवोपचक्रमे ।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**पवित्र मुसकानवाली महादेवि! सुनो। मुझे जिस प्रकार धर्मानुकूल शस्त्रोंकी प्राप्ति हुई है, उसे बता रहा हूँ। युगान्तरमें कण्वनामसे प्रसिद्ध एक महामुनि हो गये हैं। उन्होंने दिव्य तपस्या करनी आरम्भ की ।।

तथा तस्य तपो घोरं चरतः कालपर्ययात् ।।
वल्मीकं पुनरुद्भूतं तस्यैव शिरसि प्रिये ।
धरमाणश्च तत् सर्वं तपश्चर्यां तथाकरोत् ।
प्रिये! उसके अनुसार घोर तपस्या करते हुए मुनिके मस्तकपर कालक्रमसे बाँबी जम गयी। वह सब अपने मस्तकपर लिये-दिये वे पूर्ववत् तपश्चर्यामें लगे रहे ।।

तस्मै ब्रह्मा वरं दातुं जगाम तपसार्चितः ।।
दत्त्वा तस्मै वरं देवो वेणुं दृष्ट्वा त्वचिन्तयत् ।
मुनिकी तपस्यासे पूजित हुए ब्रह्माजी उन्हें वर देनेके लिये गये। वर देकर भगवान् ब्रह्माने वहाँ एक बाँस देखा और उसके उपयोगके लिये कुछ विचार किया ।।

लोककार्यं समुद्दिश्य वेणुनानेन भामिनि ।।
चिन्तयित्वा तमादाय कार्मुकार्थे न्ययोजयत् ।
भामिनि! उस बाँसके द्वारा जगत्‌का उपकार करनेके उद्देश्यसे कुछ सोचकर ब्रह्माजीने उस वेणुको हाथमें ले लिया और उसे धनुषके उपयोगमें लगाया ।।

विष्णोर्मम च सामर्थ्यं ज्ञात्वा लोकपितामहः ।।
धनुषी द्वे तदा प्रादाद् विष्णवे मम चैव तु ।
लोकपितामह ब्रह्माने भगवान् विष्णुकी और मेरी शक्ति जानकर उनके और मेरे लिये तत्काल दो धनुष बनाकर दिये ।।

पिनाकं नाम मे चापं शार्ङ्गं नाम हरेर्धनुः ।।
तृतीयमवशेषेण गाण्डीवमभवद् धनुः ।
मेरे धनुषका नाम पिनाक हुआ और श्रीहरिके धनुषका नाम शार्ङ्ग। उस वेणुके अवशेष भागसे एक तीसरा धनुष बनाया गया, जिसका नाम गाण्डीव हुआ ।।

तच्च सोमाय निर्दिश्य ब्रह्मा लोकं गतः पुनः ।।
एतत् ते सर्वमाख्यातं शस्त्रागममनिन्दिते ।)
गाण्डीव धनुष सोमको देकर ब्रह्माजी फिर अपने लोकको चले गये। अनिन्दिते! शस्त्रोंकी प्राप्तिका यह सारा वृत्तान्त मैंने तुम्हें कह सुनाया ।।

उमोवाच वाहनेष्वत्र सर्वेषु श्रीमत्स्वन्येषु सत्तम । कथं च वृषभो देव वाहनत्वमुपागतः ॥ ९ ॥ उमाने पूछा—सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महादेव! इस जगत्में अन्य सब सुन्दर वाहनोंके होते हुए क्यों वृषभ ही आपका वाहन बना है? ॥ ९ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच सुरभीमसृजद् ब्रह्मा देवधेनुं पयोमुचम् । सा सृष्टा बहुधा जाता क्षरमाणा पयोऽमृतम् ॥ १० ॥ श्रीमहेश्वरने कहा—प्रिये! ब्रह्माजीने देवताओंके लिये दूध देनेवाली सुरभि नामक गायकी सृष्टि की, जो मेघके समान दूधरूपी जलकी वर्षा करनेवाली थी। उत्पन्न हुई सुरभि अमृतमय दूध बहाती हुई अनेक रूपोंमें प्रकट हो गयी ॥ १० ॥ तस्या वत्समु खोत्सृष्टः फेनो मद्गात्रमागतः । ततो दग्धा मया गावो नानावर्णत्वमागताः ॥ ११ ॥ एक दिन उसके बछड़ेके मुखसे निकला हुआ फेन मेरे शरीरपर पड़ गया। इससे मैंने कुपित होकर गौओंको ताप देना आरम्भ किया। मेरे रोषमें दग्ध हुई गौओंके रंग नाना प्रकारके हो गये ॥ ११ ॥ ततोऽहं लोकगुरुणा शमं नीतोऽर्थवेदिना । वृषं चैनं ध्वजार्थं मे ददौ वाहनमेव च ॥ १२ ॥ अब अर्थनीतिके ज्ञाता लोकगुरु ब्रह्माने मुझे शान्त किया तथा ध्वज-चिह्न और वाहनके रूपमें यह वृषभ मुझे प्रदान किया ॥ १२ ॥

उमोवाच निवासा बहुरूपास्ते दिवि सर्वगुणान्विताः । तांश्च संत्यज्य भगवन् श्मशाने रमसे कथम् ॥ १३ ॥ उमाने पूछा—भगवन्! स्वर्गलोकमें अनेक प्रकारके सर्वगुणसम्पन्न निवासस्थान हैं, उन सबको छोड़कर आप श्मशान-भूमिमें कैसे रमते हैं? ॥ १३ ॥ केशास्थिकलिला भीमे कपालघटसंकुले । गृध्रगोमायुबहुले चिताग्निशतसंकुले ॥ १४ ॥ अशुचौ मांसकलिले वसाशोणितकर्दमे । विकीर्णान्त्रास्थिनिचये शिवानादविनादिते ॥ १५ ॥ श्मशानभूमि तो केशों और हड्डियोंसे भरी होती है। उस भयानक भूमिमें मनुष्योंकी खोपड़ियाँ और घड़ें पड़े रहते हैं। गीधों और गीदड़ोंकी जमातें जुटी रहती हैं। वहाँ सब ओर चिताएँ जला करती हैं। मांस, वसा और रक्तकी कीच-सी मची रहती है। बिखरी हुई

आँतोंवाली हड्डियोंके ढेर पड़े रहते हैं और सियारिनोंकी हुआँ-हुआँकी ध्वनि वहाँ गूँजती रहती है, ऐसे अपवित्र स्थानमें आप क्यों रहते हैं? ।। १४-१५ ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

मेध्यान्वेषी महीं कृत्स्नां विचराम्यनिशं सदा ।
न च मेध्यतरं किंचित् श्मशानादिह लक्ष्यते ।। १६ ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! मैं पवित्र स्थान ढूँढ़नेके लिये सदा सारी पृथ्वीपर दिन-रात विचरता रहता हूँ, परंतु श्मशानसे* बढ़कर दूसरा कोई पवित्रतर स्थान यहाँ मुझे नहीं दिखायी दे रहा है ।। १६ ।।

तेन मे सर्ववासानां श्मशाने रमते मनः ।
न्यग्रोधशाखासंछन्ने निर्भुग्नस्रग्विभूषिते ।। १७ ।।
इसलिये सम्पूर्ण निवासस्थानोंमेंसे श्मशानमें ही मेरा मन अधिक रमता है। वह श्मशानभूमि बरगदकी डालियोंसे आच्छादित और मुर्दोंके शरीरसे टूटकर गिरी हुई पुष्पमालाओंके द्वारा विभूषित होती है ।। १७ ।।

तत्र चैव रमन्तीमे भूतसंघाः शुचिस्मिते ।
न च भूतगणैर्देवि विनाहं वस्तुमुत्सहे ।। १८ ।।
पवित्र मुसकानवाली देवि! ये मेरे भूतगण श्मशानमें ही रमते हैं। इन भूतगणोंके बिना मैं कहीं भी रह नहीं सकता ।। १८ ।।

एष वासो हि मे मेध्यः स्वर्गीयश्च मतः शुभे ।
पुण्यः परमकश्चैव मेध्यकामैरुपास्यते ।। १९ ।।
शुभे! यह श्मशानका निवास ही मैंने अपने लिये पवित्र और स्वर्गीय माना है। यही परम पुण्यस्थली है। पवित्र वस्तुकी कामना रखनेवाले उपासक इसीकी उपासना करते हैं ।। १९ ।।

(अस्माच्छ्मशानमेध्यं तु नास्ति किंचिदनिन्दिते ।
निस्सम्पातान्मनुष्याणां तस्माच्छुचितमं स्मृतम् ।।
अनिन्दिते! इस श्मशानभूमिसे अधिक पवित्र दूसरा कोई स्थान नहीं है, क्योंकि वहाँ मनुष्योंका अधिक आना-जाना नहीं होता। इसीलिये वह स्थान पवित्रतम माना गया है ।।

स्थानं मे तत्र विहितं वीरस्थानमिति प्रिये ।
कपालशतसम्पूर्णमभिरूपं भयानकम् ।।
प्रिये! वह वीरोंका स्थान है, इसलिये मैंने वहाँ अपना निवास बनाया है। वह मृतकोंकी सैकड़ों खोपड़ियोंसे भरा हुआ भयानक स्थान भी मुझे सुन्दर लगता है ।।

मध्याह्ने संध्ययोस्तत्र नक्षत्रे रुद्रदैवते ।
आयुष्कामैरशुद्धैर्वा न गन्तव्यमिति स्थितिः ।।

दोपहरके समय, दोनों संध्याओंके समय तथा आर्द्रा नक्षत्रमें दीर्घायुकी कामना रखनेवाले अथवा अशुद्ध पुरुषोंको वहाँ नहीं जाना चाहिये, ऐसी मर्यादा है ।।
मदन्येन न शक्यं हि निहन्तुं भूतजं भयम् ।
तत्रस्थोऽहं प्रजाः सर्वाः पालयामि दिने दिने ।।
मेरे सिवा दूसरा कोई भूतजनित भयका नाश नहीं कर सकता। इसलिये मैं श्मशानमें रहकर समस्त प्रजाओंका प्रतिदिन पालन करता हूँ ।।
मन्नियोगाद् भूतसंघा न च घ्नन्तीह कंचन ।
तांस्तु लोकहितार्थाय श्मशाने रमयाम्यहम् ।।
एतत्ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।
मेरी आज्ञा मानकर ही भूतोंके समुदाय अब इस जगत्में किसीकी हत्या नहीं कर सकते हैं। सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये मैं उन भूतोंको श्मशानभूमिमें रमाये रखता हूँ। श्मशानभूमिमें रहनेका सारा रहस्य मैंने तुमको बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भगवन् देवदेवेश त्रिनेत्र वृषभध्वज ।
पिङ्गलं विकृतं भाति रूपं ते तु भयानकम् ।।
उमाने पूछा— भगवन्! देवदेवेश्वर! त्रिनेत्र! वृषभध्वज! आपका रूप पिंगल, विकृत और भयानक प्रतीत होता है ।।
भस्मदिग्धं विरूपाक्षं तीक्ष्णदंष्ट्रं जटाकुलम् ।
व्याघ्रोदरत्वक्संवीतं कपिलश्मश्रुसंततम् ।।
आपके सारे शरीरमें भभूति पुती हुई है, आपकी आँख विकराल दिखायी देती है, दाढ़ें तीखी हैं और सिरपर जटाओंका भार लदा हुआ है, आप बाघम्बर लपेटे हुए हैं और आपके मुखपर कपिल रंगकी दाढ़ी-मूँछ फैली हुई है ।।
रौद्रं भयानकं घोरं शूलपट्टिशसंयुतम् ।
किमर्थं त्वीदृशं रूपं तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
आपका रूप ऐसा रौद्र, भयानक, घोर तथा शूल और पट्टिश आदिसे युक्त किसलिये है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं कथयिष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ।
द्विविधो लौकिको भावः शीतमुष्णमिति प्रिये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— प्रिये! मैं इसका भी यथार्थ कारण बताता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। जगत्के सारे पदार्थ दो भागोंमें विभक्त हैं—शीत और उष्ण (अग्नि और

सोम) ।। तयोर्हि ग्रथितं सर्वं सौम्याग्नेयमिदं जगत् । सौम्यत्वं सततं विष्णौ मय्याग्नेयं प्रतिष्ठितम् ।। अनेन वपुषा नित्यं सर्वलोकान् बिभर्म्यहम् । अग्नि-सोम-रूप यह सम्पूर्ण जगत् उन शीत और उष्ण तत्त्वोंमें गुँथा हुआ है। सौम्य गुणकी स्थिति सदा भगवान् विष्णुमें है और मुझमें आग्नेय (तैजस) गुण प्रतिष्ठित है। इस प्रकार इस विष्णु और शिवरूप शरीरसे मैं सदा समस्त लोकोंकी रक्षा करता हूँ ।। रौद्राकृतिं विरूपाक्षं शूलपट्टिशसंयुक्तम् । आग्नेयमिति मे रूपं देवि लोकहिते रतम् ।। देवि! यह जो विकराल नेत्रोंसे युक्त और शूल-पट्टिशसे सुशोभित भयानक आकृतिवाला मेरा रूप है, यही आग्नेय है। यह सम्पूर्ण जगत्‌के हितमें तत्पर रहता है ।। यद्यहं विपरीत: स्यामेतत् त्यक्त्वा शुभानने । तदैव सर्वलोकानां विपरीतं प्रवर्त्तते ।। शुभानने! यदि मैं इस रूपको त्यागकर इसके विपरीत हो जाऊँ तो उसी समय सम्पूर्ण लोकोंकी दशा विपरीत हो जायगी ।। तस्मान्मयेदं ध्रियते रूपं लोकहितैषिणा । इति ते कथितं देवि किं भूय: श्रोतुमिच्छसि ।। देवि! इसलिये लोकहितकी इच्छासे ही मैंने यह रूप धारण किया है। अपने रूपका यह सारा रहस्य बता दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

नारद उवाच

एवं ब्रुवति देवेशे विस्मिता परमर्षयः । वाग्भिःसाञ्जलिमालाभिरभितुष्टुवुरीश्वरम् ।। नारदजी कहते हैं—देवेश्वर भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सभी महर्षि बड़े विस्मित हुए और हाथ जोड़कर अपनी वाणीद्वारा उन महादेवजीकी स्तुति करने लगे ।।

ऋषय ऊचुः

नमः शङ्कर सर्वेश नमः सर्वजगद्गुरो । नमो देवादिदेवाय नमः शशिकलाधर ।। ऋषि बोले—सर्वेश्वर शंकर! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्‌के गुरुदेव! आपको नमस्कार है। देवताओंके भी आदि देवता! आपको नमस्कार है। चन्द्रकलाधारी शिव! आपको नमस्कार है ।। नमो घोरतराद् घोर नमो रुद्राय शङ्कर । नमः शान्ततराच्छान्त नमश्चन्द्रस्य पालक ।।

अत्यन्त घोरसे भी घोर रुद्रदेव! शंकर! आपको बार-बार नमस्कार है। अत्यन्त शान्तसे भी शान्त शिव! आपको नमस्कार है। चन्द्रमाके पालक! आपको नमस्कार है॥ नमः सोमाय देवाय नमस्तुभ्यं चतुर्मुख । नमो भूतपते शम्भो जह्नुकन्याम्बुशेखर ॥ उमासहित महादेवजीको नमस्कार है। चतुर्मुख! आपको नमस्कार है। गंगाजीके जलको सिरपर धारण करनेवाले भूतनाथ शम्भो! आपको नमस्कार है॥ नमस्त्रिशूलहस्ताय पन्नगाभरणाय च । नमोऽस्तु विषमाक्षाय दक्षयज्ञप्रदाहक ॥ हाथोंमें त्रिशूल धारण करनेवाले तथा सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित आप महादेवको नमस्कार है। दक्ष-यज्ञको दग्ध करनेवाले त्रिलोचन! आपको नमस्कार है॥ नमोऽस्तु बहुनेत्राय लोकरक्षणतत्पर । अहो देवस्य माहात्म्यमहो देवस्य वै कृपा ॥ एवं धर्मपरत्वं च देवदेवस्य चार्हति । लोकरक्षामें तत्पर रहनेवाले शंकर! आपके बहुत-से नेत्र हैं, आपको नमस्कार है। अहो! महादेवजीका कैसा माहात्म्य है। अहो! रुद्रदेवकी कैसी कृपा है। ऐसी धर्मपरायणता देवदेव महादेवके ही योग्य है॥

नारद उवाच

एवं ब्रुवत्सु मुनिषु वचो देव्यब्रवीद्धरम् । सम्प्रीत्यर्थं मुनीनां सा क्षणज्ञा परमं हितम् ॥) **नारदजी कहते हैं—**जब मुनि इस प्रकार स्तुति कर रहे थे, उसी समय अवसरको जाननेवाली देवी पार्वती मुनियोंकी प्रसन्नताके लिये भगवान् शंकरसे परम हितकी बात बोलीं॥

उमोवाच

भगवन् सर्वभूतेश सर्वधर्मविदां वर । पिनाकपाणे वरद संशयो मे महानयम् ॥ २० ॥ **उमाने पूछा—**सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ! सर्वभूतेश्वर! भगवन्! वरदायक! पिनाकपाणे! मेरे मनमें यह एक और महान् संशय है॥ २०॥ अयं मुनिगणः सर्वस्तपस्तेप इति प्रभो । तपोवेषकरो लोके भ्रमते विविधाकृतिः ॥ २१ ॥ अस्य चैवर्षिसंघस्य मम च प्रियकाम्यया । एतं ममेह संदेहं वक्तुमर्हस्यरिंदम ॥ २२ ॥

प्रभो! यह जो मुनियोंका सारा समुदाय यहाँ उपस्थित है, सदा तपस्यामें संलग्न रहा है

और तपस्वीका वेष धारण किये लोकमें भ्रमण कर रहा है; इन सबकी आकृति भिन्न-भिन्न

प्रकारकी है। शत्रुदमन शिव! इस ऋषिसमुदायका तथा मेरा भी प्रिय करनेकी इच्छासे आप

मेरे इस संदेहका समाधान करें ।। २१-२२ ।।

धर्मः किंलक्षणः प्रोक्तः कथं वा चरितुं नरैः ।

शक्यो धर्ममविन्दद्भिर्धर्मज्ञ वद मे प्रभो ।। २३ ।।

प्रभो! धर्मज्ञ! धर्मका क्या लक्षण बताया गया है? तथा जो धर्मको नहीं जानते हैं ऐसे

मनुष्य उस धर्मका आचरण कैसे कर सकते हैं? यह मुझे बताइये ।। २३ ।।

नारद उवाच

ततो मुनिगणः सर्वस्तां देवीं प्रत्यपूजयत् ।

वाग्भिर्ऋग्भूषितार्थाभिः स्तवैश्चार्थविशारदैः ।। २४ ।।

नारदजी कहते हैं—तदनन्तर समस्त मुनि-समुदायने देवी पार्वतीकी ऋग्वेदके

मन्त्रार्थोंसे सुशोभित वाणी तथा उत्तम अर्थयुक्त स्तोत्रोंद्वारा स्तुति एवं प्रशंसा की ।। २४ ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतानुकम्पनम् ।

शमो दानं यथाशक्ति गार्हस्थ्यो धर्म उत्तमः ।। २५ ।।

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! किसी भी जीवकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, सब

प्राणियोंपर दया करना, मन और इन्द्रियोंपर काबू रखना तथा अपनी शक्तिके अनुसार दान

देना गृहस्थ-आश्रमका उत्तम धर्म है ।। २५ ।।

परदारेष्वसंसर्गो न्यासस्त्रीपरिरक्षणम् ।

अदत्तादानविरमो मधुमांसस्य वर्जनम् ।। २६ ।।

एष पञ्चविधो धर्मो बहुशाखः सुखोदयः ।

देहिभिर्धर्मपरमैश्चर्तव्यो धर्मसम्भवः ।। २७ ।।

(उक्त गृहस्थ-धर्मका पालन करना,) परायी स्त्रीके संसर्गसे दूर रहना, धरोहर और

स्त्रीकी रक्षा करना, बिना दिये किसीकी वस्तु न लेना तथा मांस और मदिराको त्याग देना

—से धर्मके पाँच भेद हैं, जो सुखकी प्राप्ति करानेवाले हैं। इनमेंसे एक-एक धर्मकी अनेक

शाखाएँ हैं। धर्मको श्रेष्ठ माननेवाले मनुष्योंको चाहिये कि वे पुण्यप्रद धर्मका पालन अवश्य

करें ।।

उमोवाच

भगवन् संशयः पृष्टस्तन्मे शंसितुमर्हसि ।

चातुर्वर्ण्यस्य यो धर्मः स्वे स्वे वर्णे गुणावहः ।। २८ ।।

उमाने पूछा— भगवन्! मैं एक और संशय उपस्थित करती हूँ; चारों वर्णोंका जो-जो धर्म अपने-अपने वर्णके लिये विशेष लाभकारी हो, वह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये॥ २८॥
ब्राह्मणे कीदृशो धर्मः क्षत्रिये कीदृशोऽभवत्।
वैश्ये किंलक्षणो धर्मः शूद्रे किंलक्षणो भवेत् ॥ २९ ॥
ब्राह्मणके लिये धर्मका स्वरूप कैसा है, क्षत्रियके लिये कैसा है, वैश्यके लिये उपयोगी धर्मका क्या लक्षण है तथा शूद्रके धर्मका भी क्या लक्षण है? ॥ २९ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

(एतत्ते कथयिष्यामि यत्ते देवि मनःप्रियम्।
शृणु तत् सर्वमखिलं धर्मं वर्णाश्रमाश्रितम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! तुम्हारे मनको प्रिय लगनेवाला जो यह धर्मका विषय है, उसे बताऊँगा। तुम वर्णों और आश्रमोंपर अवलम्बित समस्त धर्मका पूर्णरूपसे वर्णन सुनो ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चेति चतुर्विधम्।
ब्रह्मणा विहिताः पूर्वं लोकतन्त्रमभीप्सता ॥
कर्माणि च तदर्हाणि शास्त्रेषु विहितानि वै।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये वर्णोंके चार भेद हैं। लोकतन्त्रकी इच्छा रखनेवाले विधाताने सबसे पहले ब्राह्मणोंकी सृष्टि की है और शास्त्रोंमें उनके योग्य कर्मोंका विधान किया है॥
यदीदमेकवर्णं स्याज्जगत् सर्वं विनश्यति ॥
सहैव देवि वर्णानि चत्वारि विहितान्यतः।
देवि! यदि यह सारा जगत् एक ही वर्णका होता तो सब साथ ही नष्ट हो जाता। इसलिये विधाताने चार वर्ण बनाये हैं ॥
मुखतो ब्राह्मणाः सृष्टास्तस्मात् ते वाग्विशारदाः ॥
बाहुभ्यां क्षत्रियाः सृष्टास्तस्मात् ते बाहुगर्विताः।
ब्राह्मणोंकी सृष्टि विधाताके मुखसे हुई है, इसीलिये वे वाणीविशारद होते हैं। क्षत्रियोंकी सृष्टि दोनों भुजाओंसे हुई है, इसीलिये उन्हें अपने बाहुबलपर गर्व होता है ॥
उदरादुद्गता वैश्यास्तस्माद् वार्तोपजीविनः ॥
शूद्राश्च पादतः सृष्टास्तस्मात् ते परिचारकाः ।
तेषां धर्मांश्च कर्माणि शृणु देवि समाहिता ॥
वैश्योंकी उत्पत्ति उदरसे हुई है, इसीलिये वे उदर-पोषणके निमित्त कृषि, वाणिज्यादि वार्तावृत्तिका आश्रय ले जीवन-निर्वाह करते हैं। शूद्रोंकी सृष्टि पैरसे हुई है, इसलिये वे

परिचारक होते हैं। देवि! अब तुम एकाग्रचित्त होकर चारों वर्णोंके धर्म और कर्मोंका वर्णन

सुनो ।।

विप्राः कृता भूमिदेवा लोकानां धारणे कृताः ।

ते कैश्चिन्नावमन्तव्या ब्राह्मणा हितमिच्छुभिः ।।

ब्राह्मणको इस भूमिका देवता बनाया गया है। वे सब लोकोंकी रक्षाके लिये उत्पन्न

किये गये हैं। अतः अपने हितकी इच्छा रखनेवाले किसी भी मनुष्यको ब्राह्मणोंका अपमान

नहीं करना चाहिये ।।

यदि ते ब्राह्मणा न स्युर्दानयोगवहाः सदा ।

उभयोर्लोकयोर्देवि स्थितिर्न स्यात् समासतः ।।

देवि! यदि दान और योगका वहन करनेवाले वे ब्राह्मण न हों तो लोक और परलोक

दोनोंकी स्थिति कदापि नहीं रह सकती ।।

ब्राह्मणान् योऽवमन्येत निन्देच्च क्रोधयेच्च वा ।

प्रहरेत् हरेद् वापि धनं तेषां नराधमः ।।

कारयेद्दीनकर्माणि कामलोभविमोहनात् ।

स च मामवमन्येत मां क्रोधयति निन्दति ।।

मामेव प्रहरेन्मूढो मद्धनस्यापहारकः ।

मामेव प्रेषणं कृत्वा निन्दते मूढचेतनः ।।

जो ब्राह्मणोंका अपमान और निन्दा करता अथवा उन्हें क्रोध दिलाता या उनपर प्रहार

करता अथवा उनका धन हर लेता है या काम, लोभ एवं मोहके वशीभूत होकर उनसे नीच

कर्म कराता है, वह नराधम मेरा ही अपमान या निन्दा करता है। मुझे ही क्रोध दिलाता है,

मुझपर ही प्रहार करता है, वह मूढ़ मेरे ही धनका अपहरण करता है तथा वह मूढ़चित्त

मानव मुझे ही इधर-उधर भेजकर नीच कर्म कराता और निन्दा करता है ।।

स्वाध्यायो यजनं दानं तस्य धर्म इति स्थितिः ।

कर्माण्यध्यापनं चैव याजनं च प्रतिग्रहः ।।

सत्यं शान्तिस्तपः शौचं तस्य धर्मः सनातनः ।

वेदोंका स्वाध्याय, यज्ञ और दान ब्राह्मणका धर्म है, यह शास्त्रका निर्णय है। वेदोंको

पढ़ाना, यजमानका यज्ञ कराना और दान लेना—ये उसकी जीविकाके साधनभूत कर्म हैं।

सत्य, मनोनिग्रह, तप और शौचाचारका पालन—यह उनका सनातन धर्म है ।।

विक्रयो रसधान्यानां ब्राह्मणस्य विगर्हितः ।।

रस और धान्य (अनाज) का विक्रय करना ब्राह्मणके लिये निन्दित है ।।

तप एव सदा धर्मो ब्राह्मणस्य न संशयः ।

स तु धर्मार्थमुत्पन्नः पूर्वं धात्रा तपोबलात् ।।

सदा तप करना ही ब्राह्मणका धर्म है, इसमें संशय नहीं है। विधाताने पूर्वकालमें धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये ही अपने तपोबलसे ब्राह्मणको उत्पन्न किया था।।
न्यायतस्ते महाभागे सर्वशः समुदीरितः।
भूमिदेवा महाभागाः सदा लोके द्विजातयः ॥ ३० ॥
महाभागे! मैंने तुम्हारे निकट सब प्रकारसे धर्मका निर्णय किया है। महाभाग ब्राह्मण इस लोकमें सदा भूमिदेव माने गये हैं ॥ ३० ॥
उपवासः सदा धर्मो ब्राह्मणस्य न संशयः।
स हि धर्मार्थसम्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ३१ ॥
इसमें संशय नहीं कि उपवास (इन्द्रियसंयम) व्रतका आचरण करना ब्राह्मणके लिये सदा धर्म बतलाया गया है। धर्मार्थसम्पन्न ब्राह्मण ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ३१ ॥
तस्य धर्मक्रिया देवि ब्रह्मचर्या च न्यायतः।
व्रतोपनयनं चैव द्विजो येनोपपद्यते ॥ ३२ ॥
देवि! उसे धर्मका अनुष्ठान और न्यायतः ब्रह्मचर्यका पालन करना चाहिये। व्रतके पालनपूर्वक उपनयन-संस्कारका होना उसके लिये परम आवश्यक है, क्योंकि उसीसे वह द्विज होता है ॥ ३२ ॥
गुरुदैवतपूजार्थं स्वाध्यायाभ्यासनात्मकः।
देहिभिर्धर्मपरमैश्चर्तव्यो धर्मसम्भवः ॥ ३३ ॥
गुरु और देवताओंकी पूजा तथा स्वाध्याय और अभ्यासरूप धर्मका पालन ब्राह्मणको अवश्य करना चाहिये। धर्मपरायण देहधारियोंको उचित है कि वे पुण्यप्रद धर्मका आचरण अवश्य करें ॥ ३३ ॥

उमोवाच

भगवन् संशयो मेऽस्ति तन्मे व्याख्यातुमर्हसि।
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मं वै नैपुण्येन प्रकीर्तय ॥ ३४ ॥
उमाने कहा— भगवन्! मेरे मनमें अभी संशय रह गया है। अतः उसकी व्याख्या करके मुझे समझाइये। चारों वर्णोंका जो धर्म है, उसका पूर्णरूपसे प्रतिपादन कीजिये ॥ ३४ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

रहस्यश्रवणं धर्मो वेदव्रतनिषेवणम्।
अग्निकार्यं तथा धर्मो गुरुकार्यप्रसाधनम् ॥ ३५ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— धर्मका रहस्य सुनना, वेदोक्त व्रतका पालन करना, होम और गुरुसेवा करना—यह ब्रह्मचर्य-आश्रमका धर्म है ॥ ३५ ॥
भैक्षचर्या परो धर्मो नित्ययज्ञोपवीतिता।
नित्यं स्वाध्यायिता धर्मो ब्रह्मचर्याश्रमस्तथा ॥ ३६ ॥

ब्रह्मचारीके लिये भैक्षचर्या (गाँवोंमेंसे भिक्षा माँगकर लाना और गुरुको समर्पित करना) परम धर्म है। नित्य यज्ञोपवीत धारण किये रहना, प्रतिदिन वेदका स्वाध्याय करना और ब्रह्मचर्याश्रमके नियमोंके पालनमें लगे रहना, ब्रह्मचारीका प्रधान कर्म है ॥ ३६ ॥ गुरुणा चाभ्यनुज्ञातः समावर्तेत वै द्विजः । विन्देतानन्तरं भार्यामनुरूपां यथाविधि ॥ ३७ ॥ ब्रह्मचर्यकी अवधि समाप्त होनेपर द्विज अपने गुरुकी आज्ञा लेकर समावर्तन करे और घर आकर अनुरूप स्त्रीसे विधिपूर्वक विवाह करे ॥ ३७ ॥ शूद्रान्नवर्जनं धर्मस्तथा सत्पथसेवनम् । धर्मो नित्योपवासित्वं ब्रह्मचर्यं तथैव च ॥ ३८ ॥ ब्राह्मणको शूद्रका अन्न नहीं खाना चाहिये, यह उसका धर्म है। सन्मार्गका सेवन, नित्य उपवास-व्रत और ब्रह्मचर्यका पालन भी धर्म है ॥ ३८ ॥ आहिताग्निरधीयानो जुह्वानः संयतेन्द्रियः । विघसाशी यताहारो गृहस्थः सत्यवाक् शुचिः ॥ ३९ ॥ गृहस्थको अग्निस्थापनपूर्वक अग्निहोत्र करनेवाला, स्वाध्यायशील, होमपरायण, जितेन्द्रिय, विघसाशी, मिताहारी, सत्यवादी और पवित्र होना चाहिये ॥ ३९ ॥ अतिथिव्रतता धर्मो धर्मस्त्रेताग्निधारणम् । इष्टींश्च पशुबन्धांश्च विधिपूर्वं समाचरेत् ॥ ४० ॥ अतिथि-सत्कार करना और गार्हपत्य आदि त्रिविध अग्नियोंकी रक्षा करना उसके लिये धर्म है। वह नाना प्रकारकी इष्टियों और पशुरक्षाकर्मका भी विधिपूर्वक आचरण करे ॥ ४० ॥ यज्ञश्च परमो धर्मस्तथाहिंसा च देहिषु । अपूर्वभोजनं धर्मो विघसाशित्वमेव च ॥ ४१ ॥ यज्ञ करना तथा किसी भी जीवकी हिंसा न करना उसके लिये परम धर्म है। घरमें पहले भोजन न करना तथा विघसाशी होना—कुटुम्बके लोगोंके भोजन करानेके बाद ही अवशिष्ट अन्नका भोजन करना—यह भी उसका धर्म है ॥ ४१ ॥ भुक्ते परिजने पश्चाद् भोजनं धर्म उच्यते । ब्राह्मणस्य गृहस्थस्य श्रोत्रियस्य विशेषतः ॥ ४२ ॥ जब कुटुम्बीजन भोजन कर लें उसके पश्चात् स्वयं भोजन करना—यह गृहस्थ ब्राह्मणका विशेषतः श्रोत्रियका मुख्य धर्म बताया गया है ॥ ४२ ॥ दम्पत्योः समशीलत्वं धर्मः स्याद् गृहमेधिनः । गृह्याणां चैव देवानां नित्यपुष्पबलिक्रिया ॥ ४३ ॥ नित्योपलेपनं धर्मस्तथा नित्योपवासिता ।

पति और पत्नीका स्वभाव एक-सा होना चाहिये। यह गृहस्थका धर्म है। घरके देवताओंकी प्रतिदिन पुष्पोंद्वारा पूजा करना, उन्हें अन्नकी बलि समर्पित करना, रोज-रोज घर लीपना और प्रतिदिन व्रत रखना भी गृहस्थका धर्म है ।। ४३ १/२ ।।

सुसम्मृष्टोपलिप्ते च साज्यधूमो भवेद् गृहे ॥ ४४ ॥
एष द्विजजने धर्मो गार्हस्थ्यो लोकधारणः ।
द्विजानां च सतां नित्यं सदैवैष प्रवर्तते ॥ ४५ ॥
झाड़-बुहार, लीप-पोतकर स्वच्छ किये हुए घरमें घृतयुक्त आहुति करके उसका धुआँ फैलाना चाहिये। यह ब्राह्मणोंका गार्हस्थ्य धर्म बतलाया, जो संसारकी रक्षा करनेवाला है। अच्छे ब्राह्मणोंके यहाँ सदा ही इस धर्मका पालन किया जाता है ।। ४४-४५ ।।

यस्तु क्षत्रगतो देवि मया धर्म उदीरितः ।
तमहं ते प्रवक्ष्यामि तन्मे शृणु समाहिता ॥ ४६ ॥
देवि! मेरे द्वारा जो क्षत्रिय-धर्म बताया गया है, उसीका अब तुम्हारे समक्ष वर्णन करता हूँ, तुम मुझसे एकाग्रचित्त होकर सुनो ।। ४६ ।।

क्षत्रियस्य स्मृतो धर्मः प्रजापालनमादितः ।
निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ॥ ४७ ॥
क्षत्रियका सबसे पहला धर्म है प्रजाका पालन करना। प्रजाकी आयके छठे भागका उपभोग करनेवाला राजा धर्मका फल पाता है ।। ४७ ।।

(क्षत्रियास्तु ततो देवि द्विजानां पालने स्मृताः ।
यदि न क्षत्रियो लोके जगत् स्यादधरोत्तरम् ॥
रक्षणात् क्षत्रियैरेव जगद् भवति शाश्वतम् ।
देवि! क्षत्रिय ब्राह्मणोंके पालनमें तत्पर रहते हैं। यदि संसारमें क्षत्रिय न होता तो इस जगत्में भारी उलट-फेर या विप्लव मच जाता। क्षत्रियोंद्वारा रक्षा होनेसे ही यह जगत् सदा टिका रहता है ।।

सम्यग्गुणहितो धर्मो धर्मः पौरहितक्रिया ।
व्यवहारस्थितिर्नित्यं गुणयुक्तो महीपतिः ॥)
उत्तम गुणोंका सम्पादन और पुरवासियोंका हितसाधन उसके लिये धर्म है। गुणवान् राजा सदा न्याययुक्त व्यवहारमें स्थित रहे ।।

प्रजाः पालयते यो हि धर्मेण मनुजाधिपः ।
तस्य धर्मार्जिता लोकाः प्रजापालनसंचिताः ॥ ४८ ॥
जो राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, उसे उसके प्रजापालनरूपी धर्मके प्रभावसे उत्तम लोक प्राप्त होते हैं ।। ४८ ।।

तस्य राज्ञः परो धर्मो दमः स्वाध्याय एव च ।
अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ॥ ४९ ॥