महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअत्यन्त घोरसे भी घोर रुद्रदेव! शंकर! आपको बार-बार नमस्कार है। अत्यन्त शान्तसे भी शान्त शिव! आपको नमस्कार है। चन्द्रमाके पालक! आपको नमस्कार है॥ नमः सोमाय देवाय नमस्तुभ्यं चतुर्मुख । नमो भूतपते शम्भो जह्नुकन्याम्बुशेखर ॥ उमासहित महादेवजीको नमस्कार है। चतुर्मुख! आपको नमस्कार है। गंगाजीके जलको सिरपर धारण करनेवाले भूतनाथ शम्भो! आपको नमस्कार है॥ नमस्त्रिशूलहस्ताय पन्नगाभरणाय च । नमोऽस्तु विषमाक्षाय दक्षयज्ञप्रदाहक ॥ हाथोंमें त्रिशूल धारण करनेवाले तथा सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित आप महादेवको नमस्कार है। दक्ष-यज्ञको दग्ध करनेवाले त्रिलोचन! आपको नमस्कार है॥ नमोऽस्तु बहुनेत्राय लोकरक्षणतत्पर । अहो देवस्य माहात्म्यमहो देवस्य वै कृपा ॥ एवं धर्मपरत्वं च देवदेवस्य चार्हति । लोकरक्षामें तत्पर रहनेवाले शंकर! आपके बहुत-से नेत्र हैं, आपको नमस्कार है। अहो! महादेवजीका कैसा माहात्म्य है। अहो! रुद्रदेवकी कैसी कृपा है। ऐसी धर्मपरायणता देवदेव महादेवके ही योग्य है॥
नारद उवाच
एवं ब्रुवत्सु मुनिषु वचो देव्यब्रवीद्धरम् । सम्प्रीत्यर्थं मुनीनां सा क्षणज्ञा परमं हितम् ॥) **नारदजी कहते हैं—**जब मुनि इस प्रकार स्तुति कर रहे थे, उसी समय अवसरको जाननेवाली देवी पार्वती मुनियोंकी प्रसन्नताके लिये भगवान् शंकरसे परम हितकी बात बोलीं॥
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश सर्वधर्मविदां वर । पिनाकपाणे वरद संशयो मे महानयम् ॥ २० ॥ **उमाने पूछा—**सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ! सर्वभूतेश्वर! भगवन्! वरदायक! पिनाकपाणे! मेरे मनमें यह एक और महान् संशय है॥ २०॥ अयं मुनिगणः सर्वस्तपस्तेप इति प्रभो । तपोवेषकरो लोके भ्रमते विविधाकृतिः ॥ २१ ॥ अस्य चैवर्षिसंघस्य मम च प्रियकाम्यया । एतं ममेह संदेहं वक्तुमर्हस्यरिंदम ॥ २२ ॥