भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1151, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1151

सोम) ।। तयोर्हि ग्रथितं सर्वं सौम्याग्नेयमिदं जगत् । सौम्यत्वं सततं विष्णौ मय्याग्नेयं प्रतिष्ठितम् ।। अनेन वपुषा नित्यं सर्वलोकान् बिभर्म्यहम् । अग्नि-सोम-रूप यह सम्पूर्ण जगत् उन शीत और उष्ण तत्त्वोंमें गुँथा हुआ है। सौम्य गुणकी स्थिति सदा भगवान् विष्णुमें है और मुझमें आग्नेय (तैजस) गुण प्रतिष्ठित है। इस प्रकार इस विष्णु और शिवरूप शरीरसे मैं सदा समस्त लोकोंकी रक्षा करता हूँ ।। रौद्राकृतिं विरूपाक्षं शूलपट्टिशसंयुक्तम् । आग्नेयमिति मे रूपं देवि लोकहिते रतम् ।। देवि! यह जो विकराल नेत्रोंसे युक्त और शूल-पट्टिशसे सुशोभित भयानक आकृतिवाला मेरा रूप है, यही आग्नेय है। यह सम्पूर्ण जगत्‌के हितमें तत्पर रहता है ।। यद्यहं विपरीत: स्यामेतत् त्यक्त्वा शुभानने । तदैव सर्वलोकानां विपरीतं प्रवर्त्तते ।। शुभानने! यदि मैं इस रूपको त्यागकर इसके विपरीत हो जाऊँ तो उसी समय सम्पूर्ण लोकोंकी दशा विपरीत हो जायगी ।। तस्मान्मयेदं ध्रियते रूपं लोकहितैषिणा । इति ते कथितं देवि किं भूय: श्रोतुमिच्छसि ।। देवि! इसलिये लोकहितकी इच्छासे ही मैंने यह रूप धारण किया है। अपने रूपका यह सारा रहस्य बता दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

नारद उवाच

एवं ब्रुवति देवेशे विस्मिता परमर्षयः । वाग्भिःसाञ्जलिमालाभिरभितुष्टुवुरीश्वरम् ।। नारदजी कहते हैं—देवेश्वर भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सभी महर्षि बड़े विस्मित हुए और हाथ जोड़कर अपनी वाणीद्वारा उन महादेवजीकी स्तुति करने लगे ।।

ऋषय ऊचुः

नमः शङ्कर सर्वेश नमः सर्वजगद्गुरो । नमो देवादिदेवाय नमः शशिकलाधर ।। ऋषि बोले—सर्वेश्वर शंकर! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्‌के गुरुदेव! आपको नमस्कार है। देवताओंके भी आदि देवता! आपको नमस्कार है। चन्द्रकलाधारी शिव! आपको नमस्कार है ।। नमो घोरतराद् घोर नमो रुद्राय शङ्कर । नमः शान्ततराच्छान्त नमश्चन्द्रस्य पालक ।।