महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1150, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदोपहरके समय, दोनों संध्याओंके समय तथा आर्द्रा नक्षत्रमें दीर्घायुकी कामना रखनेवाले अथवा अशुद्ध पुरुषोंको वहाँ नहीं जाना चाहिये, ऐसी मर्यादा है ।।
मदन्येन न शक्यं हि निहन्तुं भूतजं भयम् ।
तत्रस्थोऽहं प्रजाः सर्वाः पालयामि दिने दिने ।।
मेरे सिवा दूसरा कोई भूतजनित भयका नाश नहीं कर सकता। इसलिये मैं श्मशानमें रहकर समस्त प्रजाओंका प्रतिदिन पालन करता हूँ ।।
मन्नियोगाद् भूतसंघा न च घ्नन्तीह कंचन ।
तांस्तु लोकहितार्थाय श्मशाने रमयाम्यहम् ।।
एतत्ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।
मेरी आज्ञा मानकर ही भूतोंके समुदाय अब इस जगत्में किसीकी हत्या नहीं कर सकते हैं। सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये मैं उन भूतोंको श्मशानभूमिमें रमाये रखता हूँ। श्मशानभूमिमें रहनेका सारा रहस्य मैंने तुमको बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश त्रिनेत्र वृषभध्वज ।
पिङ्गलं विकृतं भाति रूपं ते तु भयानकम् ।।
उमाने पूछा— भगवन्! देवदेवेश्वर! त्रिनेत्र! वृषभध्वज! आपका रूप पिंगल, विकृत और भयानक प्रतीत होता है ।।
भस्मदिग्धं विरूपाक्षं तीक्ष्णदंष्ट्रं जटाकुलम् ।
व्याघ्रोदरत्वक्संवीतं कपिलश्मश्रुसंततम् ।।
आपके सारे शरीरमें भभूति पुती हुई है, आपकी आँख विकराल दिखायी देती है, दाढ़ें तीखी हैं और सिरपर जटाओंका भार लदा हुआ है, आप बाघम्बर लपेटे हुए हैं और आपके मुखपर कपिल रंगकी दाढ़ी-मूँछ फैली हुई है ।।
रौद्रं भयानकं घोरं शूलपट्टिशसंयुतम् ।
किमर्थं त्वीदृशं रूपं तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
आपका रूप ऐसा रौद्र, भयानक, घोर तथा शूल और पट्टिश आदिसे युक्त किसलिये है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं कथयिष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ।
द्विविधो लौकिको भावः शीतमुष्णमिति प्रिये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— प्रिये! मैं इसका भी यथार्थ कारण बताता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। जगत्के सारे पदार्थ दो भागोंमें विभक्त हैं—शीत और उष्ण (अग्नि और