भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1149, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1149

आँतोंवाली हड्डियोंके ढेर पड़े रहते हैं और सियारिनोंकी हुआँ-हुआँकी ध्वनि वहाँ गूँजती रहती है, ऐसे अपवित्र स्थानमें आप क्यों रहते हैं? ।। १४-१५ ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

मेध्यान्वेषी महीं कृत्स्नां विचराम्यनिशं सदा ।
न च मेध्यतरं किंचित् श्मशानादिह लक्ष्यते ।। १६ ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! मैं पवित्र स्थान ढूँढ़नेके लिये सदा सारी पृथ्वीपर दिन-रात विचरता रहता हूँ, परंतु श्मशानसे* बढ़कर दूसरा कोई पवित्रतर स्थान यहाँ मुझे नहीं दिखायी दे रहा है ।। १६ ।।

तेन मे सर्ववासानां श्मशाने रमते मनः ।
न्यग्रोधशाखासंछन्ने निर्भुग्नस्रग्विभूषिते ।। १७ ।।
इसलिये सम्पूर्ण निवासस्थानोंमेंसे श्मशानमें ही मेरा मन अधिक रमता है। वह श्मशानभूमि बरगदकी डालियोंसे आच्छादित और मुर्दोंके शरीरसे टूटकर गिरी हुई पुष्पमालाओंके द्वारा विभूषित होती है ।। १७ ।।

तत्र चैव रमन्तीमे भूतसंघाः शुचिस्मिते ।
न च भूतगणैर्देवि विनाहं वस्तुमुत्सहे ।। १८ ।।
पवित्र मुसकानवाली देवि! ये मेरे भूतगण श्मशानमें ही रमते हैं। इन भूतगणोंके बिना मैं कहीं भी रह नहीं सकता ।। १८ ।।

एष वासो हि मे मेध्यः स्वर्गीयश्च मतः शुभे ।
पुण्यः परमकश्चैव मेध्यकामैरुपास्यते ।। १९ ।।
शुभे! यह श्मशानका निवास ही मैंने अपने लिये पवित्र और स्वर्गीय माना है। यही परम पुण्यस्थली है। पवित्र वस्तुकी कामना रखनेवाले उपासक इसीकी उपासना करते हैं ।। १९ ।।

(अस्माच्छ्मशानमेध्यं तु नास्ति किंचिदनिन्दिते ।
निस्सम्पातान्मनुष्याणां तस्माच्छुचितमं स्मृतम् ।।
अनिन्दिते! इस श्मशानभूमिसे अधिक पवित्र दूसरा कोई स्थान नहीं है, क्योंकि वहाँ मनुष्योंका अधिक आना-जाना नहीं होता। इसीलिये वह स्थान पवित्रतम माना गया है ।।

स्थानं मे तत्र विहितं वीरस्थानमिति प्रिये ।
कपालशतसम्पूर्णमभिरूपं भयानकम् ।।
प्रिये! वह वीरोंका स्थान है, इसलिये मैंने वहाँ अपना निवास बनाया है। वह मृतकोंकी सैकड़ों खोपड़ियोंसे भरा हुआ भयानक स्थान भी मुझे सुन्दर लगता है ।।

मध्याह्ने संध्ययोस्तत्र नक्षत्रे रुद्रदैवते ।
आयुष्कामैरशुद्धैर्वा न गन्तव्यमिति स्थितिः ।।