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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1153, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1153

प्रभो! यह जो मुनियोंका सारा समुदाय यहाँ उपस्थित है, सदा तपस्यामें संलग्न रहा है

और तपस्वीका वेष धारण किये लोकमें भ्रमण कर रहा है; इन सबकी आकृति भिन्न-भिन्न

प्रकारकी है। शत्रुदमन शिव! इस ऋषिसमुदायका तथा मेरा भी प्रिय करनेकी इच्छासे आप

मेरे इस संदेहका समाधान करें ।। २१-२२ ।।

धर्मः किंलक्षणः प्रोक्तः कथं वा चरितुं नरैः ।

शक्यो धर्ममविन्दद्भिर्धर्मज्ञ वद मे प्रभो ।। २३ ।।

प्रभो! धर्मज्ञ! धर्मका क्या लक्षण बताया गया है? तथा जो धर्मको नहीं जानते हैं ऐसे

मनुष्य उस धर्मका आचरण कैसे कर सकते हैं? यह मुझे बताइये ।। २३ ।।

नारद उवाच

ततो मुनिगणः सर्वस्तां देवीं प्रत्यपूजयत् ।

वाग्भिर्ऋग्भूषितार्थाभिः स्तवैश्चार्थविशारदैः ।। २४ ।।

नारदजी कहते हैं—तदनन्तर समस्त मुनि-समुदायने देवी पार्वतीकी ऋग्वेदके

मन्त्रार्थोंसे सुशोभित वाणी तथा उत्तम अर्थयुक्त स्तोत्रोंद्वारा स्तुति एवं प्रशंसा की ।। २४ ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतानुकम्पनम् ।

शमो दानं यथाशक्ति गार्हस्थ्यो धर्म उत्तमः ।। २५ ।।

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! किसी भी जीवकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, सब

प्राणियोंपर दया करना, मन और इन्द्रियोंपर काबू रखना तथा अपनी शक्तिके अनुसार दान

देना गृहस्थ-आश्रमका उत्तम धर्म है ।। २५ ।।

परदारेष्वसंसर्गो न्यासस्त्रीपरिरक्षणम् ।

अदत्तादानविरमो मधुमांसस्य वर्जनम् ।। २६ ।।

एष पञ्चविधो धर्मो बहुशाखः सुखोदयः ।

देहिभिर्धर्मपरमैश्चर्तव्यो धर्मसम्भवः ।। २७ ।।

(उक्त गृहस्थ-धर्मका पालन करना,) परायी स्त्रीके संसर्गसे दूर रहना, धरोहर और

स्त्रीकी रक्षा करना, बिना दिये किसीकी वस्तु न लेना तथा मांस और मदिराको त्याग देना

—से धर्मके पाँच भेद हैं, जो सुखकी प्राप्ति करानेवाले हैं। इनमेंसे एक-एक धर्मकी अनेक

शाखाएँ हैं। धर्मको श्रेष्ठ माननेवाले मनुष्योंको चाहिये कि वे पुण्यप्रद धर्मका पालन अवश्य

करें ।।

उमोवाच

भगवन् संशयः पृष्टस्तन्मे शंसितुमर्हसि ।

चातुर्वर्ण्यस्य यो धर्मः स्वे स्वे वर्णे गुणावहः ।। २८ ।।