भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1147, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1147

श्रीमहेश्वर उवाच

शस्त्रागमं ते वक्ष्यामि शृणु धर्म्यं शुचिस्मिते ।
युगान्तरे महादेवि कण्वो नाम महामुनिः ।।
स हि दिव्यां तपश्चर्यां कर्तुमेवोपचक्रमे ।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**पवित्र मुसकानवाली महादेवि! सुनो। मुझे जिस प्रकार धर्मानुकूल शस्त्रोंकी प्राप्ति हुई है, उसे बता रहा हूँ। युगान्तरमें कण्वनामसे प्रसिद्ध एक महामुनि हो गये हैं। उन्होंने दिव्य तपस्या करनी आरम्भ की ।।

तथा तस्य तपो घोरं चरतः कालपर्ययात् ।।
वल्मीकं पुनरुद्भूतं तस्यैव शिरसि प्रिये ।
धरमाणश्च तत् सर्वं तपश्चर्यां तथाकरोत् ।
प्रिये! उसके अनुसार घोर तपस्या करते हुए मुनिके मस्तकपर कालक्रमसे बाँबी जम गयी। वह सब अपने मस्तकपर लिये-दिये वे पूर्ववत् तपश्चर्यामें लगे रहे ।।

तस्मै ब्रह्मा वरं दातुं जगाम तपसार्चितः ।।
दत्त्वा तस्मै वरं देवो वेणुं दृष्ट्वा त्वचिन्तयत् ।
मुनिकी तपस्यासे पूजित हुए ब्रह्माजी उन्हें वर देनेके लिये गये। वर देकर भगवान् ब्रह्माने वहाँ एक बाँस देखा और उसके उपयोगके लिये कुछ विचार किया ।।

लोककार्यं समुद्दिश्य वेणुनानेन भामिनि ।।
चिन्तयित्वा तमादाय कार्मुकार्थे न्ययोजयत् ।
भामिनि! उस बाँसके द्वारा जगत्‌का उपकार करनेके उद्देश्यसे कुछ सोचकर ब्रह्माजीने उस वेणुको हाथमें ले लिया और उसे धनुषके उपयोगमें लगाया ।।

विष्णोर्मम च सामर्थ्यं ज्ञात्वा लोकपितामहः ।।
धनुषी द्वे तदा प्रादाद् विष्णवे मम चैव तु ।
लोकपितामह ब्रह्माने भगवान् विष्णुकी और मेरी शक्ति जानकर उनके और मेरे लिये तत्काल दो धनुष बनाकर दिये ।।

पिनाकं नाम मे चापं शार्ङ्गं नाम हरेर्धनुः ।।
तृतीयमवशेषेण गाण्डीवमभवद् धनुः ।
मेरे धनुषका नाम पिनाक हुआ और श्रीहरिके धनुषका नाम शार्ङ्ग। उस वेणुके अवशेष भागसे एक तीसरा धनुष बनाया गया, जिसका नाम गाण्डीव हुआ ।।

तच्च सोमाय निर्दिश्य ब्रह्मा लोकं गतः पुनः ।।
एतत् ते सर्वमाख्यातं शस्त्रागममनिन्दिते ।)
गाण्डीव धनुष सोमको देकर ब्रह्माजी फिर अपने लोकको चले गये। अनिन्दिते! शस्त्रोंकी प्राप्तिका यह सारा वृत्तान्त मैंने तुम्हें कह सुनाया ।।