महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1146, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं पिनाकं मे करे स्थितम् ॥ ७ ॥
लोगोंके हितकी कामनासे ही मैं जटाधारी ब्रह्मचारीके वेषमें रहता हूँ। देवताओंका हित करनेके लिये पिनाक सदा मेरे हाथमें रहता है ॥ ७ ॥
इन्द्रेण च पुरा वज्रं क्षिप्तं श्रीकाङ्क्षिणा मम ।
दग्ध्वा कण्ठं तु तद् यातं तेन श्रीकण्ठता मम ॥ ८ ॥
पूर्वकालमें इन्द्रने मेरी श्री प्राप्त करनेकी इच्छासे मुझपर वज्रका प्रहार किया था। वह वज्र मेरा कण्ठ दग्ध करके चला गया। इससे मेरी श्रीकण्ठ नामसे ख्याति हुई ॥ ८ ॥
(पुरा युगान्तरे यत्नादमृतार्थं सुरासुरैः ।
बलवद्भिर्विमथितश्चिरकालं महोदधिः ॥
प्राचीन कालके दूसरे युगकी बात है, बलवान् देवताओं और असुरोंने मिलकर अमृतकी प्राप्तिके लिये महान् प्रयास करते हुए चिरकालतक महासागरका मन्थन किया था ॥
रज्जुना नागराजेन मथ्यमाने महोदधौ ।
विषं तत्र समुद्भूतं सर्वलोकविनाशनम् ॥
नागराज वासुकिकी रस्सीसे बँधी हुई मन्दराचलरूपी मथानीद्वारा जब महासागर मथा जाने लगा, तब उससे सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेवाला विष प्रकट हुआ ॥
तद् दृष्ट्वा विबुधाः सर्वे तदा विमनसोऽभवन् ।
ग्रस्तं हि तन्मया देवि लोकानां हितकारणात् ॥
उसे देखकर सब देवताओंका मन उदास हो गया। देवि! तब मैंने तीनों लोकोंके हितके लिये उस विषको स्वयं पी लिया ॥
तत्कृता नीलता चासीत् कण्ठे बर्हिनिभा शुभे ।
तदाप्रभृति चैवाहं नीलकण्ठ इति स्मृतः ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।
शुभे! उस विषके ही कारण मेरे कण्ठमें मोर-पंखके समान नीले रंगका चिह्न बन गया। तभीसे मैं नीलकण्ठ कहा जाने लगा। ये सारी बातें मैंने तुम्हें बता दी। अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥
उमोवाच
नीलकण्ठ नमस्तेऽस्तु सर्वलोकसुखावह ॥
बहूनामायुधानां त्वं पिनाकं धर्तुमिच्छसि ।
किमर्थं देवदेवेश तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा—सम्पूर्ण लोकोंको सुख देनेवाले नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है। देवदेवेश्वर! बहुत-से आयुधोंके होते हुए भी आप पिनाकको ही किसलिये धारण करना चाहते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥