महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमेरे इन पिताको आपने जो पूर्ववत् वृक्षोंसे आच्छादित कर दिया, इसका क्या कारण है? ।।
(एष मे संशयो देव हृदि मे सम्प्रवर्तते ।
देवदेव नमस्तुभ्यं तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
देवदेव! मेरे हृदयमें यह संदेह विद्यमान है। आप इसका समाधान करनेकी कृपा करें। आपको मेरा सादर नमस्कार है ।।
नारद उवाच
एवमुक्तस्तथा देव्या प्रीयमाणोऽब्रवीद् भवः ॥)
नारदजी कहते हैं—देवी पार्वतीके ऐसा कहने-पर भगवान् शंकर प्रसन्न होकर बोले ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
(स्थाने संशयितुं देवि धर्मज्ञे प्रियभाषिणी ।।
त्वदृते मां हि वै प्रष्टुं न शक्यं केनचित् प्रिये ।
श्रीमहेश्वरने कहा—धर्मको जानने तथा प्रिय वचन बोलनेवाली देवि! तुमने जो संशय उपस्थित किया है, वह उचित ही है। प्रिये! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मुझसे ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता ।।
प्रकाशं यदि वा गुह्यं प्रियार्थं प्रब्रवीम्यहम् ।।
शृणु तत् सर्वमखिलमस्यां संसदि भामिनी ।
भामिनि! प्रकट या गुप्त जो भी बात होगी, तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैं सब कुछ बताऊँगा। तुम इस सभामें मुझसे सारी बातें सुनो ।।
सर्वेषामेव लोकानां कूटस्थं विद्धि मां प्रिये ।।
मदधीनास्त्रयो लोका यथा विष्णौ तथा मयि ।
स्रष्टा विष्णुरहं गोप्ता इत्येतद् विद्धि भामिनि ।।
प्रिये! सभी लोकोंमें मुझे कूटस्थ समझो। तीनों लोक मेरे अधीन हैं। ये जैसे भगवान् विष्णुके अधीन हैं, उसी प्रकार मेरे भी अधीन हैं। भामिनि! तुम यही जान लो कि भगवान् विष्णु जगत्के स्रष्टा हैं और मैं इसकी रक्षा करनेवाला हूँ ।।
तस्माद् यदा मां स्पृशति शुभं वा यदि वेतरत् ।
तथैवेदं जगत् सर्वं तत्तद् भवति शोभने ॥)
शोभने! इसीलिये जब मुझसे शुभ या अशुभका स्पर्श होता है, तब यह सारा जगत् वैसा ही शुभ या अशुभ हो जाता है ।।
नेत्रे मे संवृते देवि त्वया बाल्यादनिन्दिते ।
नष्टालोकस्तदा लोकः क्षणेन समपद्यत ॥ ४३ ॥