भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1144, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1144

तस्या धृत्या च बुद्ध्या च प्रीतमानभवत् प्रभुः ॥ ५० ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! गिरिराजकुमारी उमाके इस प्रकार पूछनेपर पिनाकधारी भगवान् शिव उनके धैर्य और बुद्धिसे बहुत प्रसन्न हुए ॥ ५० ॥ ततस्तामब्रवीद् देवः सुभगे श्रूयतामिति । हेतुभिर्यैर्ममैतानि रूपाणि रुचिरानने ॥ ५१ ॥ तत्पश्चात् उन्होंने पार्वतीजीसे कहा—'सुभगे! रुचिरानने! जिन हेतुओंसे मेरे ये रूप हुए हैं, उन्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादो नाम चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादनामक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४० ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ५७ १/२ श्लोक हैं)