भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1221, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1221

गुप्तचरोंद्वारा और कार्यकी प्रवृत्तिसे देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानकर उसपर विचार करे। तत्पश्चात् अशुभका तत्काल निवारण करे और अपने लिये शुभका सेवन करे ।। गर्ह्यान् विगर्हयेदेव पूज्यान् सम्पूजयेत् तथा । दण्ड्यांश्च दण्डयेद् देवि नात्र कार्या विचारणा ।। देवि! राजा निन्दनीय मनुष्योंकी निन्दा ही करे, पूजनीय पुरुषोंका पूजन करे और दण्डनीय अपराधियोंको दण्ड दे। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।। पञ्चापेक्षं सदा मन्त्रं कुर्याद् बुद्धियुतैनरैः । कुलवृत्तश्रुतोपेतैर्नित्यं मन्त्रपरो भवेत् ।। पाँच व्यक्तियोंकी अपेक्षा रखकर अर्थात् पाँच मन्त्रियोंके साथ बैठकर सदा ही राज-कार्यके विषयमें गुप्त मन्त्रणा करे। जो बुद्धिमान्, कुलीन, सदाचारी और शास्त्रज्ञानसम्पन्न हों, उन्हींके साथ राजाको सदा मन्त्रणा करनी चाहिये ।। कामकारेण वैमुख्यैर्नैव मन्त्रमना भवेत् । राजा राष्ट्रहितापेक्षं सत्यधर्माणि कारयेत् ।। जो इच्छानुसार राज्यकार्यसे विमुख हो जाते हों, ऐसे लोगोंके साथ मन्त्रणा करनेका विचार भी मनमें नहीं लाना चाहिये। राजाको राष्ट्रके हितका ध्यान रखकर सत्य-धर्मका पालन करना और कराना चाहिये ।। सर्वोद्योगं स्वयं कुर्याद् दुर्गादिषु सदा नृषु । देशवृद्धिकरान् भृत्यानप्रमादेन कारयेत् ।। देशक्षयकरान् सर्वानप्रियांश्च विसर्जयेत् । अहन्यहनि सम्पश्येदनुजीविगणं स्वयं ।। दुर्ग आदि तथा मनुष्योंकी देखभालके लिये राजा सम्पूर्ण उद्योग सदा स्वयं ही करे। वह देशकी उन्नति करनेवाले भृत्योंको सावधानीके साथ कार्यमें नियुक्त करे और देशको हानि पहुँचानेवाले समस्त अप्रियजनोंका परित्याग कर दे। जो राजाके आश्रित होकर जीविका चला रहे हों, ऐसे लोगोंकी देखभाल भी राजा प्रतिदिन स्वयं ही करे ।। सुमुखः सुप्रियो दत्त्वा सम्यग्वृत्तं समाचरेत् । अधर्म्यं परुषं तीक्ष्णं वाक्यं वक्तुं न चार्हति ।। वह प्रसन्नमुख और सबका परम प्रिय होकर लोगोंको जीविका दे, उनके साथ उत्तम बर्ताव करे। किसीसे पापपूर्ण, रूखा और तीखा वचन बोलना उसके लिये कदापि उचित नहीं ।। अविश्वास्यं हि वचनं वक्तुं सत्सु न चार्हति । नरे नरे गुणान् दोषान् सम्यग्वेदितुमर्हति ।। सत्पुरुषोंके बीचमें वह कभी ऐसी बात न कहे, जो विश्वासके योग्य न हो। प्रत्येक मनुष्यके गुणों और दोषोंको उसे अच्छी तरह समझना चाहिये ।।