महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1225, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[योद्धाओंके धर्मका वर्णन तथा रणयज्ञमें प्राणोत्सर्गकी महिमा]
श्रीमहेश्वर उवाच
अथ यस्तु सहायार्थमुक्ताः स्यात् पार्थिवैनरैः ।।
भोगानां संविभागेन वस्त्राभरणभूषणैः ।
सहभोजनसम्बन्धैः सत्कारैर्विविधैरपि ।।
सहायकाले सम्प्राप्ते संग्रामे शस्त्रमुद्धरेत् ।।
भगवान् महेश्वर कहते हैं—राजा भाँति-भाँतिके भोग, वस्त्र और आभूषण देकर जिन
लोगोंको अपनी सहायताके लिये बुलाता और रखता है, उनके साथ भोजन करके घनिष्ठ
सम्बन्ध स्थापित करता है और नाना प्रकारके सत्कारोंद्वारा उन्हें संतुष्ट करता है, ऐसे
योद्धाओंको उचित है कि युद्ध छिड़ जानेपर सहायताके समय उस राजाके लिये शस्त्र
उठावे ।।
हन्यमानेष्वभिघ्नत्सु शूरेषु रणसंकटे ।
पृष्ठं दत्त्वा च ये तत्र नायकस्य नराधमाः ।।
अनाहता निवर्तन्ते नायके चाप्यनीप्सति ।
ते दुष्कृतं प्रपद्यन्ते नायकस्याखिलं नराः ।।
यच्चास्ति सुकृतं तेषां युज्यते तेन नायकः ।
जब घोर संग्राममें शूरवीर एक-दूसरेको मारते और मारे जाते हों, उस अवसरपर जो
नराधम सैनिक पीठ देकर सेनानायककी इच्छा न होते हुए भी बिना घायल हुए ही युद्धसे
मुँह मोड़ लेते हैं, वे सेनापतिके सम्पूर्ण पापोंको स्वयं ही ग्रहण कर लेते हैं और उन भगोड़ोंके
पास जो कुछ भी पुण्य होता है, वह सेनानायकको प्राप्त हो जाता है ।।
अहिंसा परमो धर्म इति येऽपि नरा विदुः ।
संग्रामेषु न युध्यन्ते भृत्याश्चैवानुरूपतः ।।
नरकं यान्ति ते घोरं भर्तृपिण्डापहारिणः ।।
‘अहिंसा परम धर्म है,’ ऐसी जिनकी मान्यता है, वे भी यदि राजाके सेवक हैं, उनसे
भरण-पोषणकी सुविधा एवं भोजन पाते हैं, ऐसी दशामें भी वे अपनी शक्तिके अनुरूप
संग्रामोंमें जूझते नहीं हैं तो घोर नरकमें पड़ते हैं; क्योंकि वे स्वामीके अन्नका अपहरण
करनेवाले हैं ।।
यस्तु प्राणान् परित्यज्य प्रविशेदुद्यतायुधः ।
संग्राममग्निप्रतिमं पतंग इव निर्भयः ।।
स्वर्गमाविशते ज्ञात्वा योधस्य गतिनिश्चयम् ।।
जो अपने प्राणोंकी परवाह छोड़कर पतंगकी भाँति निर्भय हो हाथमें हथियार उठाये
अग्निके समान विनाशकारी संग्राममें प्रवेश कर जाता है और योद्धाको मिलनेवाली निश्चित