महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1227, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमारे गये योद्धाओंके जो वस्त्र, आभूषण और सुवर्ण हैं, वे ही मानो उस रणयज्ञकी दक्षिणा हैं ।। यस्तत्र हन्यते देवि गजस्कन्धगतो नरः । ब्रह्मलोकमवाप्नोति रणेष्वभिमुखो हतः ।। देवि! जो संग्राममें हाथीकी पीठपर बैठा हुआ युद्धके मुहानेपर मारा जाता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ।। रथमध्यगतो वापि हयपृष्ठगतोऽपि वा । हन्यते यस्तु संग्रामे शक्रलोके महीयते ।। रथके बीचमें बैठा हुआ या घोड़ेकी पीठपर चढ़ा हुआ जो वीर युद्धमें मारा जाता है, वह इन्द्रलोकमें सम्मानित होता है ।। स्वर्गे हताः प्रपूज्यन्ते हन्ता त्वत्रैव पूज्यते । द्वावेतौ सुखमेधेते हन्ता यश्चैव हन्यते ।। मारे गये योद्धा स्वर्गमें पूजित होते हैं; किन्तु मारनेवाला इसी लोकमें प्रशंसित होता है। अतः युद्धमें दोनों ही सुखी होते हैं—जो मारता है वह और जो मारा जाता है वह ।। तस्मात् संग्राममासाद्य प्रहर्तव्यमभीतवत् ।। निर्भयो यस्तु संग्रामे प्रहरेदुद्यतायुधः ।। यथा नदीसहस्राणि प्रविष्टानि महोदधिम् । तथा सर्वे न संदेहो धर्मा धर्मभृतां वरम् ।। अतः संग्रामभूमिमें पहुँच जानेपर निर्भय होकर शत्रुपर प्रहार करना चाहिये। जो हथियार उठाकर संग्राममें निर्भय होकर प्रहार करता है, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ उस वीरको निस्संदेह सभी धर्म प्राप्त होते हैं। ठीक उसी तरह जैसे महासागरमें सहस्रों नदियाँ आकर मिलती हैं ।। धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । तस्माद् धर्मो न हन्तव्यः पार्थिवेन विशेषतः ।। धर्म ही, यदि उसका हनन किया जाय तो मारता है और धर्म ही सुरक्षित होनेपर रक्षा करता है; अतः प्रत्येक मनुष्यको, विशेषतः राजाको धर्मका हनन नहीं करना चाहिये ।। प्रजाः पालयते यत्र धर्मेण वसुधाधिपः । षट्कर्मनिरता विप्राः पूज्यन्ते पितृदैवतैः ।। नैव तस्मिन्ननावृष्टिर्न रोगा नाप्युपद्रवाः । धर्मशीलाः प्रजाः सर्वाः स्वधर्मनिरते नृपे ।। जहाँ राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है तथा जहाँ पितरों और देवताओंके साथ षट्कर्मपरायण ब्राह्मणोंकी पूजा होती है, उस देशमें न तो कभी अनावृष्टि होती है, न