भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1236, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1236

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[त्रिवर्गका निरूपण तथा कल्याणकारी आचार-व्यवहारका वर्णन]
श्रीमहेश्वर उवाच

विद्या वार्ता च सेवा च कारुत्वं नाट्यता तथा ।
इत्येते जीवनार्थाय मर्त्यानां विहिताः प्रिये ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! विद्या, वार्ता, सेवा, शिल्पकला और अभिनय-कला—ये मनुष्योंके जीवन-निर्वाहके लिये पाँच वृत्तियाँ बनायी गयी हैं॥

विद्यायोगस्तु सर्वेषां पूर्वमेव विधीयते ।
कार्याकार्यं विजानन्ति विद्यया देवि नान्यथा ॥
देवि! सभी मनुष्योंके लिये विद्याका योग पहले ही निश्चित कर दिया जाता है। विद्यासे लोग कर्तव्य और अकर्तव्यको जानते हैं, अन्यथा नहीं॥

विद्यया स्फीयते ज्ञानं ज्ञानात् तत्त्वविदर्शनम् ।
दृष्टतत्त्वो विनीतात्मा सर्वार्थस्य च भाजनम् ॥
विद्यासे ज्ञान बढ़ता है, ज्ञानसे तत्त्वका दर्शन होता है और तत्त्वका दर्शन कर लेनेके पश्चात् मनुष्य विनीतचित्त होकर समस्त पुरुषार्थोंका भाजन हो जाता है॥

शक्यं विद्याविनीतेन लोके संजीवनं शुभम् ॥
आत्मानं विद्यया तस्मात् पूर्वं कृत्वा तु भाजनम् ।
वश्येन्द्रियो जितक्रोधो भूतात्मानं तु भावयेत् ॥
विद्यासे विनीत हुआ पुरुष संसारमें शुभ जीवन बिता सकता है; अतः अपने आपको पहले विद्याद्वारा पुरुषार्थका भाजन बनाकर क्रोधविजयी एवं जितेन्द्रिय पुरुष सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा-परमात्माका चिन्तन करे॥

भावयित्वा तदाऽऽत्मानं पूजनीयः सतामपि ॥
कुलानुवृत्तं वृत्तं वा पूर्वमात्मा समाश्रयेत् ।
परमात्माका चिन्तन करके मनुष्य सत्पुरुषोंके लिये भी पूजनीय बन जाता है। जीवात्मा पहले कुल-परम्परासे चले आते हुए सदाचारका ही आश्रय ले॥

यदि चेद् विद्यया चैव वृत्तिं काङ्क्षेतधात्मनः ॥
राजविद्यां तु वा देवि लोकविद्यामथापि वा ।
तीर्थतश्चापि गृह्णीयाच्छुश्रूषादिगुणैर्युतः ॥
ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव दृढं कुर्यात् प्रयत्नतः ॥
देवि! यदि विद्यासे अपनी जीविका चलानेकी इच्छा हो तो शुश्रूषा आदि गुणोंसे सम्पन्न हो किसी गुरुसे राजविद्या अथवा लोकविद्याकी शिक्षा ग्रहण करे और उसे ग्रन्थ एवं अर्थके अभ्यासद्वारा प्रयत्नपूर्वक दृढ़ करे॥

एवं विद्याफलं देवि प्राप्नुयान्नान्यथा नरः ।