महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1257, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकेन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
उमाने पूछा—प्रभो! कुछ मनुष्य सदा मुखके रोगसे व्यथित रहते हैं, दाँत, कण्ठ और
कपोलोंके रोगसे अत्यन्त कष्ट भोगते हैं, कुछ तो जन्मसे ही रोगी होते हैं और कुछ जन्म
लेनेके बाद कारणवश उन रोगोंके शिकार हो जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है?
यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु देवि समाहिता ।।
कुवक्तारस्तु ये देवि जिह्वया कटुकं भृशम् ।
असत्यं परुषं घोरं गुरून् प्रति परान् प्रति ।।
जिह्वाबाधां तदान्येषां कुर्वते कोपकारणात् ।
प्रायशोऽनृतभूयिष्ठा नराः कार्यवशेन वा ।।
तेषां जिह्वाप्रदेशस्था व्याधयः सम्भवन्ति ते ।।
श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! एकाग्रचित होकर सुनो, मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें सब कुछ
बताता हूँ। जो कुवाक्य बोलनेवाले मनुष्य अपनी जिह्वासे गुरुजनों या दूसरोंके प्रति अत्यन्त
कड़वे, झूठे, रूखे तथा घोर वचन बोलते हैं, जो क्रोधके कारण दूसरोंकी जीभ काट लेते हैं
अथवा जो कार्यवश प्रायः अधिकाधिक झूठ ही बोलते हैं, उनके जिह्वाप्रदेशमें ही रोग होते
हैं।।
कुश्रोतारस्तु ये चार्थं परेषां कर्णनाशकाः ।
कर्णरोगान् बहुविधाँल्लभन्ते ते पुनर्भावे ।।
जो परदोष और निन्दादियुक्त कुवचन सुनते हैं तथा जो दूसरोंके कानोंको हानि
पहुँचाते हैं, वे दूसरे जन्ममें कर्ण-सम्बन्धी नाना प्रकारके रोगोंका कष्ट भोगते हैं ।।
दन्तरोगशिरोरोगकर्णरोगास्तथैव च ।
अन्ये मुखाश्रिताः दोषाः सर्वे चात्मकृतं फलम् ।।
ऐसे ही लोगोंको दन्तरोग, शिरोरोग, कर्णरोग तथा अन्य सभी मुखसम्बन्धी दोष अपनी
करनीके फलरूपसे प्राप्त होते हैं ।।
उमोवाच
पीड्यन्ते सततं देव मानुषेष्वेव केचन ।
कुक्षिपक्षाश्रितैर्दोषैर्व्याधिभिश्चोदराश्रितैः ।।
उमाने पूछा—देव! मनुष्योंमें कुछ लोग सदा कुक्षि और पक्षसम्बन्धी दोषों तथा
उदरसम्बन्धी रोगोंसे पीड़ित रहते हैं ।।
तीक्ष्णशूलैश्च पीड्यन्ते नरा दुःखपरिप्लुताः ।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।