भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1402, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1402

सम्पूर्ण देवता उनके श्रीविग्रहमें सुखपूर्वक निवास करते हैं। वे कमलनयन श्रीहरि अपने गर्भ (वक्षःस्थल)-में लक्ष्मीको निवास देते हैं। लक्ष्मीके साथ ही वे रहते हैं ॥ १४ ॥

शार्ङ्गचक्रायुधः खड्गी सर्वनागरिपुध्वजः । उत्तमेन स शीलेन दमेन च शमेन च ॥ १५ ॥ पराक्रमेण वीर्येण वपुषा दर्शनेन च । आरोहेण प्रमाणेन धैर्येणार्जवसम्पदा ॥ १६ ॥ आनृशंस्येन रूपेण बलेन च समन्वितः । अस्त्रैः समुदितः सर्वैर्दिव्यैरद्भुतदर्शनैः ॥ १७ ॥

शार्ङ्गधनुष, सुदर्शनचक्र और नन्दक नामक खड्ग—उनके आयुध हैं। उनकी ध्वजामें सम्पूर्ण नागोंके शत्रु गरुड़का चिह्न सुशोभित है। वे उत्तम शील, शम, दम, पराक्रम, वीर्य, सुन्दर शरीर, उत्तम दर्शन, सुडौल आकृति, धैर्य, सरलता, कोमलता, रूप और बल आदि सद्गुणोंसे सम्पन्न हैं। सब प्रकारके दिव्य और अद्भुत अस्त्र-शस्त्र उनके पास सदा मौजूद रहते हैं ॥ १५—१७ ॥

योगमायः सहस्राक्षो निरपायो महामनाः । वीरो मित्रजनश्लाघी ज्ञातिबन्धुजनप्रियः ॥ १८ ॥ क्षमावांश्चानहंवादी ब्रह्मण्यो ब्रह्मनायकः । भयहर्ता भयार्तानां मित्राणां नन्दिवर्धनः ॥ १९ ॥

वे योगमायासे सम्पन्न और हजारों नेत्रोंवाले हैं। उनका हृदय विशाल है। वे अविनाशी, वीर, मित्रजनोंके प्रशंसक, ज्ञाति एवं बन्धु-बान्धवोंके प्रिय, क्षमाशील, अहंकाररहित, ब्राह्मणभक्त, वेदोंका उद्धार करनेवाले, भयातुर पुरुषोंका भय दूर करनेवाले और मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाले हैं ॥ १८-१९ ॥

शरण्यः सर्वभूतानां दीनानां पालने रतः । श्रुतवानर्थसम्पन्नः सर्वभूतनमस्कृतः ॥ २० ॥ समाश्रितानां वरदः शत्रूणामपि धर्मवित् । नीतिज्ञो नीतिसम्पन्नो ब्रह्मवादी जितेन्द्रियः ॥ २१ ॥

वे समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले, दीन-दुखियोंके पालनमें तत्पर, शास्त्रज्ञानसम्पन्न, धनवान्, सर्वभूतवन्दित, शरणमें आये हुए शत्रुओंको भी वर देनेवाले, धर्मज्ञ, नीतिज्ञ, नीतिमान्, ब्रह्मवादी और जितेन्द्रिय हैं ॥ २०-२१ ॥

भवार्थमिह देवानां बुद्ध्या परमया युतः । प्राजापत्ये शुभे मार्गे मानवे धर्मसंस्कृते ॥ २२ ॥ समुत्पत्स्यति गोविन्दो मनोर्वंशे महात्मनः । अङ्गो नाम मनोः पुत्रो अन्तर्धामा ततः परः ॥ २३ ॥