भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1403, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1403

परम बुद्धिसे सम्पन्न भगवान् गोविन्द यहाँ देवताओंकी उन्नतिके लिये प्रजापतिके शुभमार्गपर स्थित हो मनुके धर्म-संस्कृत कुलमें अवतार लेंगे। महात्मा मनुके वंशमें मनुपुत्र अंग नामक राजा होंगे। उनसे अन्तर्धामा नामवाले पुत्रका जन्म होगा ॥ २२-२३ ॥

अन्तर्धाम्नो हविर्धामा प्रजापतिरनिन्दितः ।
प्राचीनबर्हिर्भविता हविर्धाम्नः सुतो महान् ॥ २४ ॥
अन्तर्धामासे अनिन्द्य प्रजापति हविर्धामाकी उत्पत्ति होगी। हविर्धामाके पुत्र महाराज प्राचीनबर्हि होंगे ॥ २४ ॥

तस्य प्रचेतःप्रमुखा भविष्यन्ति दशात्मजाः ।
प्राचेतसस्तथा दक्षो भवितेह प्रजापतिः ॥ २५ ॥
प्राचीनबर्हिके प्रचेता आदि दस पुत्र होंगे। उन दसों प्रचेताओंस इस जगत्में प्रजापति दक्षका प्रादुर्भाव होगा ॥ २५ ॥

दाक्षायण्यास्तथाऽऽदित्यो मनुरादित्यतस्तथा ।
मनोश्च वंशज इला सुद्युम्नश्च भविष्यति ॥ २६ ॥
दक्षकन्या अदितिसे आदित्य (सूर्य) उत्पन्न होंगे। सूर्यसे मनु उत्पन्न होंगे। मनुके वंशमें इला नामक कन्या होगी, जो आगे चलकर सुद्युम्न नामक पुत्रके रूपमें परिणत हो जायगी ॥ २६ ॥

बुधात् पुरूरवाश्चापि तस्मादायुर्भविष्यति ।
नहुषो भविता तस्माद् ययातिस्तस्य चात्मजः ॥ २७ ॥
कन्यावस्थामें बुधसे समागम होनेपर उससे पुरूरवाका जन्म होगा। पुरूरवासे आयु नामक पुत्रकी उत्पत्ति होगी। आयुके पुत्र नहुष और नहुषके ययाति होंगे ॥ २७ ॥

यदुस्तस्मान्महासत्त्वः क्रोष्टा तस्माद् भविष्यति ।
क्रोष्टुश्चैव महान् पुत्रो वृजिनीवान् भविष्यति ॥ २८ ॥
ययातिसे महान् बलशाली यदु होंगे। बहुसे क्रोष्टाका जन्म होगा, क्रोष्टासे महान् पुत्र वृजिनीवान् होंगे ॥ २८ ॥

वृजिनीवतश्च भविता उषङ्गुरपराजितः ।
उषङ्गोर्भविता पुत्रः शूरश्चित्ररथस्तथा ॥ २९ ॥
वृजिनीवान्‌से विजय वीर उषंगुका जन्म होगा। उषंगुका पुत्र शूरवीर चित्ररथ होगा ॥ २९ ॥

तस्य त्ववरजः पुत्रः शूरो नाम भविष्यति ।
तेषां विख्यातवीर्याणां चरित्रगुणशालिनाम् ॥ ३० ॥
यज्वनां सुविशुद्धानां वंशे ब्राह्मणसम्मते ।
स शूरः क्षत्रियश्रेष्ठो महावीर्यो महायशाः ।
स्ववंशविस्तरकरं जनयिष्यति मानदः ॥ ३१ ॥