महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
परम बुद्धिसे सम्पन्न भगवान् गोविन्द यहाँ देवताओंकी उन्नतिके लिये प्रजापतिके शुभमार्गपर स्थित हो मनुके धर्म-संस्कृत कुलमें अवतार लेंगे। महात्मा मनुके वंशमें मनुपुत्र अंग नामक राजा होंगे। उनसे अन्तर्धामा नामवाले पुत्रका जन्म होगा ॥ २२-२३ ॥
अन्तर्धाम्नो हविर्धामा प्रजापतिरनिन्दितः ।
प्राचीनबर्हिर्भविता हविर्धाम्नः सुतो महान् ॥ २४ ॥
अन्तर्धामासे अनिन्द्य प्रजापति हविर्धामाकी उत्पत्ति होगी। हविर्धामाके पुत्र महाराज प्राचीनबर्हि होंगे ॥ २४ ॥
तस्य प्रचेतःप्रमुखा भविष्यन्ति दशात्मजाः ।
प्राचेतसस्तथा दक्षो भवितेह प्रजापतिः ॥ २५ ॥
प्राचीनबर्हिके प्रचेता आदि दस पुत्र होंगे। उन दसों प्रचेताओंस इस जगत्में प्रजापति दक्षका प्रादुर्भाव होगा ॥ २५ ॥
दाक्षायण्यास्तथाऽऽदित्यो मनुरादित्यतस्तथा ।
मनोश्च वंशज इला सुद्युम्नश्च भविष्यति ॥ २६ ॥
दक्षकन्या अदितिसे आदित्य (सूर्य) उत्पन्न होंगे। सूर्यसे मनु उत्पन्न होंगे। मनुके वंशमें इला नामक कन्या होगी, जो आगे चलकर सुद्युम्न नामक पुत्रके रूपमें परिणत हो जायगी ॥ २६ ॥
बुधात् पुरूरवाश्चापि तस्मादायुर्भविष्यति ।
नहुषो भविता तस्माद् ययातिस्तस्य चात्मजः ॥ २७ ॥
कन्यावस्थामें बुधसे समागम होनेपर उससे पुरूरवाका जन्म होगा। पुरूरवासे आयु नामक पुत्रकी उत्पत्ति होगी। आयुके पुत्र नहुष और नहुषके ययाति होंगे ॥ २७ ॥
यदुस्तस्मान्महासत्त्वः क्रोष्टा तस्माद् भविष्यति ।
क्रोष्टुश्चैव महान् पुत्रो वृजिनीवान् भविष्यति ॥ २८ ॥
ययातिसे महान् बलशाली यदु होंगे। बहुसे क्रोष्टाका जन्म होगा, क्रोष्टासे महान् पुत्र वृजिनीवान् होंगे ॥ २८ ॥
वृजिनीवतश्च भविता उषङ्गुरपराजितः ।
उषङ्गोर्भविता पुत्रः शूरश्चित्ररथस्तथा ॥ २९ ॥
वृजिनीवान्से विजय वीर उषंगुका जन्म होगा। उषंगुका पुत्र शूरवीर चित्ररथ होगा ॥ २९ ॥
तस्य त्ववरजः पुत्रः शूरो नाम भविष्यति ।
तेषां विख्यातवीर्याणां चरित्रगुणशालिनाम् ॥ ३० ॥
यज्वनां सुविशुद्धानां वंशे ब्राह्मणसम्मते ।
स शूरः क्षत्रियश्रेष्ठो महावीर्यो महायशाः ।
स्ववंशविस्तरकरं जनयिष्यति मानदः ॥ ३१ ॥
वसुदेव इति ख्यातं पुत्रमानकदुन्दुभिम् ।
तस्य पुत्रश्चतुर्बाहुर्वासुदेवो भविष्यति ॥ ३२ ॥
उसका छोटा पुत्र शूर नामसे विख्यात होगा। वे सभी यदुवंशी विख्यात पराक्रमी, सदाचार और सद्गुणसे सुशोभित, यज्ञशील और विशुद्ध आचार-विचारवाले होंगे। उनका कुल ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित होगा। उस कुलमें महापराक्रमी, महायशस्वी और दूसरोंको सम्मान देनेवाले क्षत्रिय-शिरोमणि शूर अपने वंशका विस्तार करनेवाले वसुदेव नामक पुत्रको जन्म देंगे, जिसका दूसरा नाम आनकदुन्दुभि होगा। उन्हींके पुत्र चार भुजाधारी भगवान् वासुदेव होंगे ॥ ३०—३२ ॥
दाता ब्राह्मणसत्कर्ता ब्रह्मभूतो द्विजप्रियः ।
राज्ञो मागधसंरुद्धान् मोक्षयिष्यति यादवः ॥ ३३ ॥
भगवान् वासुदेव दानी, ब्राह्मणोंका सत्कार करनेवाले, ब्रह्मभूत और ब्राह्मणप्रिय होंगे। वे यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण मगधराज जरासंधकी कैदमें पड़े हुए राजाओंको बन्धनसे छुड़ायेंगे ॥ ३३ ॥
जरासंधं तु राजानं निर्जित्य गिरिगह्वरे ।
सर्वपार्थिवरत्नाढ्यो भविष्यति स वीर्यवान् ॥ ३४ ॥
वे पराक्रमी श्रीहरि पर्वतकी कन्दरा (राजगृह)-में राजा जरासंधको जीतकर समस्त राजाओंके द्वारा उपहृत रत्नोंसे सम्पन्न होंगे ॥ ३४ ॥
पृथिव्यामप्रतिहतो वीर्येण च भविष्यति ।
विक्रमेण च सम्पन्नः सर्वपार्थिवपार्थिवः ॥ ३५ ॥
वे इस भूमण्डलमें अपने बल-पराक्रमद्वारा अजेय होंगे। विक्रमसे सम्पन्न तथा समस्त राजाओंके भी राजा होंगे ॥ ३५ ॥
शूरसेनेषु भूत्वा स द्वारकायां वसन् प्रभुः ।
पालयिष्यति गां देवीं विजित्य नयवित् सदा ॥ ३६ ॥
नीतिवेत्ता भगवान् श्रीकृष्ण शूरसेन देश (मथुरा-मण्डल)-में अवतीर्ण होकर वहाँसे द्वारकापुरीमें जाकर रहेंगे और समस्त राजाओंको जीतकर सदा इस पृथ्वीदेवीका पालन करेंगे ॥ ३६ ॥
तं भवन्तः समासाद्य वाङ्माल्यैरर्हणैर्वरैः ।
अर्चयन्तु यथान्यायं ब्रह्माणमिव शाश्वतम् ॥ ३७ ॥
आपलोग उन्हीं भगवान्की शरण लेकर अपनी वाङ्मयी मालाओं तथा श्रेष्ठ पूजनोपचारोंसे सनातन ब्रह्माकी भाँति उनका यथोचित पूजन करें ॥ ३७ ॥
यो हि मां द्रष्टुमिच्छेत ब्रह्माणं च पितामहम् ।
द्रष्टव्यस्तेन भगवान् वासुदेवः प्रतापवान् ॥ ३८ ॥
जो मेरा और पितामह ब्रह्माजीका दर्शन करना चाहता हो, उसे प्रतापी भगवान् वासुदेवका दर्शन करना चाहिये ॥ ३८ ॥ दृष्टे तस्मिन्नहं दृष्टो न मेऽत्रास्ति विचारणा । पितामहो वा देवेश इति वित्त तपोधनाः ॥ ३९ ॥ तपोधनो! उनका दर्शन हो जानेपर मेरा ही दर्शन हो गया, अथवा उनके दर्शनसे देवेश्वर ब्रह्माजीका दर्शन हो गया ऐसे समझो, इस विषयमें मुझे कोई विचार नहीं करना है अर्थात् संदेह नहीं है ॥ ३९ ॥ स यस्य पुण्डरीकाक्षः प्रीतियुक्तो भविष्यति । तस्य देवगणः प्रीतो ब्रह्मपूर्वो भविष्यति ॥ ४० ॥ जिसपर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न होंगे, उसके ऊपर ब्रह्मा आदि देवताओंका समुदाय प्रसन्न हो जायगा ॥ ४० ॥ यश्च तं मानवे लोके संश्रयिष्यति केशवम् । तस्य कीर्तिर्जयश्चैव स्वर्गश्चैव भविष्यति ॥ ४१ ॥ मानवलोकमें जो भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेगा, उसे कीर्ति, विजय तथा उत्तम स्वर्गकी प्राप्ति होगी ॥ ४१ ॥ धर्माणां देशिकः साक्षात् स भविष्यति धर्मभाक् । धर्मवद्भिः स देवेशो नमस्कार्यः सदोद्यतैः ॥ ४२ ॥ इतना ही नहीं, वह धर्मोंका उपदेश देनेवाला साक्षात् धर्माचार्य एवं धर्मफलका भागी होगा। अतः धर्मात्मा पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा उत्साहित रहकर देवेश्वर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करें ॥ ४२ ॥ धर्म एव परो हि स्यात् तस्मिन्नभ्यर्चिते विभौ । स हि देवो महातेजाः प्रजाहितचिकीर्षया ॥ ४३ ॥ धर्मार्थं पुरुषव्याघ्र ऋषिकोटीः ससर्ज ह । ताः सृष्टास्तेन विभुना पर्वते गन्धमादने ॥ ४४ ॥ सनत्कुमारप्रमुखास्तिष्ठन्ति तपसान्विताः । तस्मात् स वाग्मी धर्मज्ञो नमस्यो द्विजपुङ्गवाः ॥ ४५ ॥ उन सर्वव्यापी परमेश्वरकी पूजा करनेसे परम धर्मकी सिद्धि होगी। वे महान् तेजस्वी देवता हैं। उन पुरुषसिंह श्रीकृष्णने प्रजाका हित करनेकी इच्छासे धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये करोड़ों ऋषियोंकी सृष्टि की है। भगवान्के उत्पन्न किये हुए वे सनत्कुमार आदि ऋषि गन्धमादन पर्वतपर सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं। अतः द्विजवरो! उन प्रवचन-कुशल, धर्मज्ञ वासुदेवको सदा प्रणाम करना चाहिये ॥ ४३—४५ ॥ दिवि श्रेष्ठो हि भगवान् हरिनारायणः प्रभुः । वन्दितो हि स वन्देत मानितो मानयीत च ।
अर्हितश्चार्हयेन्नित्यं पूजितः प्रतिपूजयेत् ॥ ४६ ॥ वे भगवान् नारायण हरि देवलोकमें सबसे श्रेष्ठ हैं। जो उनकी वन्दना करता है, उसकी वे भी वन्दना करते हैं। जो उनका आदर करता है, उसका वे भी आदर करते हैं। इसी प्रकार अर्चित होनेपर वे भी अर्चना करते और पूजित या प्रशंसित होनेपर वे भी पूजा या प्रशंसा करते हैं ॥ ४६ ॥
दृष्टः पश्येदहरहः संश्रितः प्रतिसंश्रयेत् । अर्चितश्चार्चयेन्नित्यं स देवो द्विजसत्तमाः ॥ ४७ ॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो प्रतिदिन उनका दर्शन करता है, उसकी ओर वे भी कृपादृष्टि करते हैं। जो उनका आश्रय लेता है, उसके हृदयमें वे भी आश्रय लेते हैं तथा जो उनकी पूजा करता है, उसकी वे भी सदा पूजा करते हैं ॥ ४७ ॥
एतत् तस्यानवद्यस्य विष्णोर्वै परमं व्रतम् । आदिदेवस्य महतः सज्जनाचरितं सदा ॥ ४८ ॥ उन प्रशंसनीय आदि देवता भगवान् महाविष्णुका यह उत्तम व्रत है, जिसका साधु पुरुष सदा आचरण करते आये हैं ॥ ४८ ॥
भुवनेऽभ्यर्चितो नित्यं देवैरपि सनातनः । अभयेनानुरूपेण युज्यन्ते तमनुव्रताः ॥ ४९ ॥ वे सनातन देवता हैं, अतः इस त्रिभुवनमें देवता भी सदा उन्हींकी पूजा करते हैं। जो उनके अनन्य भक्त हैं, वे अपने भजनके अनुरूप ही निर्भय पद प्राप्त करते हैं ॥ ४९ ॥
कर्मणा मनसा वाचा स नमस्यो द्विजैः सदा । यत्नवद्भिरुपस्थाय द्रष्टव्यो देवकीसुतः ॥ ५० ॥ द्विजोंको चाहिये कि वे मन, वाणी और कर्मसे सदा उन भगवान्को प्रणाम करें और यत्नपूर्वक उपासना करके उन देवकीनन्दनका दर्शन करें ॥ ५० ॥
एष वोऽभिहितो मार्गो मया वै मुनिसत्तमाः । तं दृष्ट्वा सर्वशो देवं दृष्टाः स्युः सुरसत्तमाः ॥ ५१ ॥ मुनिवरो! यह मैंने आपलोगोंको उत्तम मार्ग बता दिया है। उन भगवान् वासुदेवका सब प्रकारसे दर्शन कर लेनेपर सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवताओंका दर्शन करना हो जायगा ॥ ५१ ॥
महावराहं तं देवं सर्वलोकपितामहम् । अहं चैव नमस्यामि नित्यमेव जगत्पतिम् ॥ ५२ ॥ मैं भी महावराहरूप धारण करनेवाले उन सर्वलोक-पितामह जगदीश्वरको नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ ५२ ॥
तत्र च त्रितयं दृष्टं भविष्यति न संशयः । समस्ता हि वयं देवास्तस्य देहे वसामहे ॥ ५३ ॥
हम सब देवता उनके श्रीविग्रहमें निवास करते हैं। अतः उनका दर्शन करनेसे तीनों देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु और शिव)-का दर्शन हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ।। ५३ ।। तस्य चैवाग्रजो भ्राता सिताद्रिनिचयप्रभः । हली बल इति ख्यातो भविष्यति धराधरः ।। ५४ ।। उनके बड़े भाई कैलासकी पर्वतमालाओंके समान श्वेत कान्तिसे प्रकाशित होनेवाले हलधर और बलरामके नामसे विख्यात होंगे। पृथ्वीको धारण करनेवाले शेषनाग ही बलरामके रूपमें अवतीर्ण होंगे ।। ५४ ।। त्रिशिरास्तस्य दिव्यश्च शातकुम्भमयो द्रुमः । ध्वजस्तृणेन्द्रो देवस्य भविष्यति रथाश्रितः ।। ५५ ।। बलदेवजीके रथपर तीन शिखाओंसे युक्त दिव्य सुवर्णमय तालवृक्ष ध्वजके रूपमें सुशोभित होगा ।। ५५ ।। शिरो नागैर्महाभोगैः परिकीर्णं महात्मभिः । भविष्यति महाबाहोः सर्वलोकेश्वरस्य च ।। ५६ ।। सर्वलोकेश्वर महाबाहु बलरामजीका मस्तक बड़े-बड़े फनवाले विशालकाय सर्पोंसे घिरा हुआ होगा ।। ५६ ।। चिन्तितानि समेष्यन्ति शस्त्राण्यस्त्राणि चैव ह । अनन्तश्च स एवोक्तो भगवान् हरिरव्ययः ।। ५७ ।। उनके चिन्तन करते ही सम्पूर्ण दिव्य अस्त्र-शस्त्र उन्हें प्राप्त हो जायँगे। अविनाशी भगवान् श्रीहरि ही अनन्त शेषनाग कहे गये हैं ।। ५७ ।। समादिष्टश्च विबुधैर्दर्शय त्वमिति प्रभो । सुपर्णो यस्य वीर्येण कश्यपस्यात्मजो बली । अन्तं नैवाशकद् द्रष्टुं देवस्य परमात्मनः ।। ५८ ।। पूर्वकालमें देवताओंने गरुड़जीसे यह अनुरोध किया कि 'आप हमें भगवान् शेषका अन्त दिखा दीजिये।' तब कश्यपके बलवान् पुत्र गरुड़ अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उन परमात्मदेव अनन्तका अन्त न देख सके ।। ५८ ।। स च शेषो विचरते परया वै मुदा युतः । अन्तर्वसति भोगेन परिरभ्य वसुन्धराम् ।। ५९ ।। वे भगवान् शेष बड़े आनन्दके साथ सर्वत्र विचरते हैं और अपने विशाल शरीरसे पृथिवीको आलिंगनपाशमें बाँधकर पाताललोकमें निवास करते हैं ।। ५९ ।। य एव विष्णुः सोऽनन्तो भगवान् वसुधाधरः । यो रामः स हृषीकेशो योऽच्युतः स धराधरः ।। ६० ।। जो भगवान् विष्णु हैं, वे ही इस पृथिवीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त हैं। जो बलराम हैं वे ही श्रीकृष्ण हैं, जो श्रीकृष्ण हैं वे ही भूमिधर बलराम हैं ।। ६० ।।
तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ दिव्यौ दिव्यपराक्रमौ ।
द्रष्टव्यौ माननीयौ च चक्रलाङ्गलधारिणौ ॥ ६१ ॥
वे दोनों दिव्य रूप और दिव्य पराक्रमसे सम्पन्न पुरुषसिंह बलराम और श्रीकृष्ण क्रमशः चक्र एवं हल धारण करनेवाले हैं। तुम्हें उन दोनोंका दर्शन एवं सम्मान करना चाहिये ॥ ६१ ॥
एष वोऽनुग्रहः प्रोक्तो मया पुण्यस्तपोधनाः ।
यद् भवन्तो यदुश्रेष्ठं पूजयेयुः प्रयत्नतः ॥ ६२ ॥
तपोधनो! आपलोगोंपर अनुग्रह करके मैंने भगवान्का पवित्र माहात्म्य इसलिये बताया है कि आप प्रयत्नपूर्वक उन यदुकुलतिलक श्रीकृष्णकी पूजा करें ॥ ६२ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पुरुषमाहात्म्ये
सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें परमपुरुष श्रीकृष्णका माहात्म्यविषयक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४७ ॥
भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन और भीष्मजीका युधिष्ठिरको राज्य करनेके लिये आदेश देना
अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन और भीष्मजीका युधिष्ठिरको राज्य करनेके लिये आदेश देना
नारद उवाच
अथ व्योम्नि महान् शब्दः सविद्युत्स्तनयित्नुमान् ।
मेघैश्च गगनं नीलं संरुद्धमभवद् घनैः ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**तदनन्तर आकाशमें बिजलीकी गड़गड़ाहट और मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके साथ महान् शब्द होने लगा। मेघोंकी घनघोर घटासे घिरकर सारा आकाश नीला हो गया ॥ १ ॥
प्रावृषीव च पर्जन्यो ववृषे निर्मलं पयः ।
तमश्चैवाभवद् घोरं दिशश्च न चकाशिरे ॥ २ ॥
वर्षाकालकी भाँति मेघसमूह निर्मल जलकी वर्षा करने लगा। सब ओर घोर अन्धकार छा गया। दिशाएँ नहीं सूझती थीं ॥ २ ॥
ततो देवगिरौ तस्मिन् रम्ये पुण्ये सनातने ।
न शर्वं भूतसंघं वा ददृशुर्मुनयस्तदा ॥ ३ ॥
उस समय उस रमणीय, पवित्र एवं सनातन देवगिरिपर ऋषियोंने जब दृष्टिपात किया, तब उन्हें वहाँ न तो भगवान् शंकर दिखायी दिये और न भूतोंके समुदायका ही दर्शन हुआ ॥ ३ ॥
व्यभ्रं च गगनं सद्यः क्षणेन समपद्यत ।
तीर्थयात्रां ततो विप्रा जग्मुश्चान्ये यथागतम् ॥ ४ ॥
फिर तो तत्काल एक ही क्षणमें सारा आसमान साफ हो गया। कहीं भी बादल नहीं रह गया। तब ब्राह्मणलोग वहाँसे तीर्थयात्राके लिये चल दिये और अन्य लोग भी जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये ॥ ४ ॥
तदद्भुतमचिन्त्यं च दृष्ट्वा ते विस्मिताऽभवन् ।
शङ्करस्योमया सार्धं संवादं त्वत्कथाश्रयम् ॥ ५ ॥
स भवान् पुरुषव्याघ्र ब्रह्मभूतः सनातनः ।
यदर्थमनुशिष्टाः स्मो गिरिपृष्ठे महात्मना ॥ ६ ॥
यह अद्भुत और अचिन्त्य घटना देखकर सब लोग आश्चर्यचकित हो उठे। पुरुषसिंह देवकीनन्दन! भगवान् शंकरका पार्वतीजीके साथ जो आपके सम्बन्धमें संवाद हुआ, उसे
सुनकर हम इस निश्चयपर पहुँच गये हैं कि वे ब्रह्मभूत सनातन पुरुष आप ही हैं। जिनके लिये हिमालयके शिखरपर महादेवजीने हमलोगोंको उपदेश दिया था ।। ५-६ ।। द्वितीयं त्वद्भुतमिदं त्वत्तेजः कृतमद्य वै । दृष्ट्वा च विस्मिताः कृष्ण सा च नः स्मृतिरागता ।। ७ ।। श्रीकृष्ण! आपके तेजसे दूसरी अद्भुत घटना आज यह घटित हुई है, जिसे देखकर हम चकित हो गये हैं और हमें पूर्वकालकी वह शंकरजीवाली बात पुनः स्मरण हो रही है ।। ७ ।। एतत् ते देवदेवस्य माहात्म्यं कथितं प्रभो । कपर्दिनो गिरीशस्य महाबाहो जनार्दन ।। ८ ।। प्रभो! महाबाहु जनार्दन! यह मैंने आपके समक्ष जटाजूटधारी देवाधिदेव गिरीशके माहात्म्यका वर्णन किया है ।। ८ ।। इत्युक्तः स तदा कृष्णस्तपोवननिवासिभिः । मानयामास तान् सर्वानृषीन् देवकीनन्दनः ।। ९ ।। तपोवन-निवासी मुनियोंके ऐसा कहनेपर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने उस समय उन सबका विशेष सत्कार किया ।। ९ ।। अथर्षयः सम्प्रहृष्टाः पुनस्ते कृष्णमब्रुवन् । पुनः पुनः दर्शयास्मान् सदैव मधुसूदन ।। १० ।। तदनन्तर वे महर्षि पुनः हर्षमें भरकर श्रीकृष्णसे बोले—'मधुसूदन! आप सदा ही हमें बारंबार दर्शन देते रहें ।। १० ।। न हि नः सा रतिः स्वर्गे या च त्वद्दर्शने विभो । तदृतं च महाबाहो यदाह भगवान् भवः ।। ११ ।। 'प्रभो! आपके दर्शनमें हमारा जितना अनुराग है, उतना स्वर्गमें भी नहीं है। महाबाहो! भगवान् शिवने जो कहा था, वह सर्वथा सत्य हुआ ।। ११ ।। एतत् ते सर्वमाख्यातं रहस्यमरिकर्शन । त्वमेव ह्यर्थतत्त्वज्ञः पृष्टोऽस्मान् पृच्छसे यदा ।। १२ ।। तदस्माभिरिदं गुह्यं त्वत्प्रियार्थमुदाहृतम् । न च तेऽविदितं किंचित्त्रिषु लोकेषु विद्यते ।। १३ ।। 'शत्रुसूदन! यह सारा रहस्य मैंने आपसे कहा है, आप ही अर्थ-तत्त्वके ज्ञाता हैं। हमने आपसे पूछा था, परंतु आप स्वयं ही जब हमसे प्रश्न करने लगे, तब हमलोगोंने आपकी प्रसन्नताके लिये इस गोपनीय रहस्यका वर्णन किया है। तीनों लोकोंमें कोई ऐसी बात नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो ।। १२-१३ ।। जन्म चैव प्रसूतिश्च यच्चान्यत् कारणं विभो । वयं तु बहुचापल्यादशक्ता गुह्यधारणे ।। १४ ।।
'प्रभो! आपका जो यह अवतार अर्थात् मानव-शरीरमें जन्म हुआ है तथा जो इसका गुप्त कारण है, यह सब तथा अन्य बातें आपसे छिपी नहीं हैं। हमलोग तो अपनी अत्यन्त चपलताके कारण इस गूढ़ विषयको अपने मनमें ही छिपाये रखनेमें असमर्थ हो गये हैं॥ १४॥
ततः स्थिते त्वयि विभो लघुत्वात् प्रलपामहे।
न हि किंचित् तदाश्चर्यं यन्न वेत्ति भवानिह॥ १५॥
दिवि वा भुवि वा देव सर्वं हि विदितं तव।
'भगवन्! इसीलिये आपके रहते हुए भी हम अपने ओछेपनके कारण प्रलाप करते हैं—छोटे मुँह बड़ी बात कर रहे हैं। देव! पृथ्वीपर या स्वर्गमें कोई भी ऐसी आश्चर्यकी बात नहीं है, जिसे आप नहीं जानते हों। आपको सब कुछ ज्ञात है॥ १५१/२॥
साधयाम वयं कृष्ण बुद्धिं पुष्टिमवाप्नुहि॥ १६॥
'श्रीकृष्ण! अब आप हमें जानेकी आज्ञा दें, जिससे हम अपना कार्य साधन करें। आपको उत्तम बुद्धि और पुष्टि प्राप्त हो॥ १६॥
पुत्रस्ते सदृशस्तात विशिष्टो वा भविष्यति।
महाप्रभावसंयुक्तो दीप्तिकीर्तिकरः प्रभुः॥ १७॥
तात! आपको आपके समान अथवा आपसे भी बढ़कर पुत्र प्राप्त हो। वह महान् प्रभावसे युक्त, दीप्तिमान्, कीर्तिका विस्तार करनेवाला और सर्वसमर्थ हो'॥ १७॥
भीष्म उवाच
ततः प्रणम्य देवेशं यादवं पुरुषोत्तमम्।
प्रदक्षिणमुपावृत्य प्रजग्मुस्ते महर्षयः॥ १८॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर वे महर्षि उन यदुकुलरत्न देवेश्वर पुरुषोत्तमको प्रणाम और उनकी परिक्रमा करके चले गये॥ १८॥
सोऽयं नारायणः श्रीमान् दीप्त्या परमया युतः।
व्रतं यथावत् तच्चीर्त्वा द्वारकां पुनरागमत्॥ १९॥
तत्पश्चात् परम कान्तिसे युक्त ये श्रीमान् नारायण अपने व्रतको यथावत्रूपसे पूर्ण करके पुनः द्वारकापुरीमें चले आये॥ १९॥
पूर्णे च दशमे मासि पुत्रोऽस्य परमाद्भुतः।
रुक्मिण्यां सम्मतो जज्ञे शूरो वंशधरः प्रभो॥ २०॥
प्रभो! दसवाँ मास पूर्ण होनेपर इन भगवान्के रुक्मिणी देवीके गर्भसे एक परम अद्भुत, मनोरम एवं शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो इनका वंश चलानेवाला है॥ २०॥
स कामः सर्वभूतानां सर्वभावगतो नृप।
असुराणां सुराणां च चरत्यन्तर्गतः सदा॥ २१॥
नरेश्वर! जो सम्पूर्ण प्राणियोंके मानसिक संकल्पमें व्याप्त रहनेवाला है और देवताओं तथा असुरोंके भी अन्तःकरणमें सदा विचरता रहता है, वह कामदेव ही भगवान् श्रीकृष्णका वंशधर है ॥ २१ ॥
सोऽयं पुरुषशार्दूलो मेघवर्णश्चतुर्भुजः । संश्रितःपाण्डवान् प्रेम्णा भवन्तश्चैनमाश्रिताः ॥ २२ ॥ वे ही ये चार भुजाधारी घनश्याम पुरुषसिंह श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक तुम पाण्डवोंके आश्रित हैं और तुमलोग भी इनके शरणागत हो ॥ २२ ॥
कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिश्चैव स्वर्गमार्गस्तथैव च । यत्रैष संस्थितस्तत्र देवो विष्णुस्त्रिविक्रमः ॥ २३ ॥ ये त्रिविक्रम विष्णुदेव जहाँ विद्यमान हैं, वहीं कीर्ति, लक्ष्मी, धृति तथा स्वर्गका मार्ग है ॥ २३ ॥
सेन्द्रा देवास्त्रयस्त्रिंशदेष नात्र विचारणा । आदिदेवो महादेवः सर्वभूतप्रतिश्रयः ॥ २४ ॥ इन्द्र आदि तैंतीस देवता इन्हींके स्वरूप हैं, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। ये ही सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले आदिदेव महादेव हैं ॥ २४ ॥
अनादिनिधनोऽव्यक्तो महात्मा मधुसूदनः । अयं जातो महातेजाः सुराणामर्थसिद्धये ॥ २५ ॥ इनका न आदि है न अन्त। ये अव्यक्तस्वरूप, महातेजस्वी महात्मा मधुसूदन देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये यदुकुलमें उत्पन्न हुए हैं ॥ २५ ॥
सुदुस्तरार्थतत्त्वस्य वक्ता कर्ता च माधवः । तव पार्थ जयः कृत्स्नस्तव कीर्तिस्तथातुला ॥ २६ ॥ तवेयं पृथिवी देवी कृत्स्ना नारायणाश्रयात् । अयं नाथस्तवाचिन्त्यो यस्य नारायणो गतिः ॥ २७ ॥ ये माधव दुर्बोध तत्त्वके वक्ता और कर्ता हैं। कुन्तीनन्दन! तुम्हारी सम्पूर्ण विजय, अनुपम कीर्ति और अखिल भूमण्डलका राज्य—ये सब भगवान् नारायणका आश्रय लेनेसे ही तुम्हें प्राप्त हुए हैं। ये अचिन्त्यस्वरूप नारायण ही तुम्हारे रक्षक और परमगति हैं ॥ २६-२७ ॥
स भवांस्त्वमुपाध्वर्यू रणाग्नौ हुतवान् नृपान् । कृष्णस्रुवेण महता युगान्ताग्निसमेन वै ॥ २८ ॥ तुमने स्वयं होता बनकर प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी श्रीकृष्णरूपी विशाल स्रुवाके द्वारा समराग्निकी ज्वालामें सम्पूर्ण राजाओंकी आहुति दे डाली है ॥ २८ ॥
दुर्योधनश्च शोच्योऽसौ सपुत्रभ्रातृबान्धवः । कृतवान् योऽबुद्धिः क्रोधाद्धरिगाण्डीविविग्रहम् ॥ २९ ॥
आज वह दुर्योधन अपने पुत्र, भाई और सम्बन्धियोंसहित शोकका विषय हो गया है; क्योंकि उस मूर्खने क्रोधके आवेशमें आकर श्रीकृष्ण और अर्जुनसे युद्ध ठाना था॥ २९॥ दैतेया दानवेन्द्राश्च महाकाया महाबलाः। चक्राग्नौ क्षयमापन्ना दावाग्नौ शलभा इव ॥ ३० ॥ कितने ही विशाल शरीरवाले महाबली दैत्य और दानव दावानलमें दग्ध होनेवाले पतंगोंकी तरह श्रीकृष्णकी चक्राग्निमें स्वाहा हो चुके हैं॥ ३०॥ प्रतियोद्धुं न शक्यो हि मानुषैरेष संयुगे। विहीनैः पुरुषव्याघ्र सत्त्वशक्तिबलादिभिः ॥ ३१ ॥ पुरुषसिंह! सत्त्व (धैर्य), शक्ति और बल आदिसे स्वभावतः हीन मनुष्य युद्धमें इन श्रीकृष्णका सामना नहीं कर सकते॥ ३१॥ जयो योगी युगान्ताभः सव्यसाची रणाग्रगः। तेजसा हतवान् सर्वं सुयोधनबलं नृप ॥ ३२ ॥ अर्जुन भी योगशक्तिसे सम्पन्न और युगान्तकालकी अग्निके समान तेजस्वी हैं। ये बायें हाथसे भी बाण चलाते हैं और रणभूमिमें सबसे आगे रहते हैं। नरेश्वर! इन्होंने अपने तेजसे दुर्योधनकी सारी सेनाका संहार कर डाला है॥ ३२॥ यत् तु गोवृषभांकेन मुनिभ्यः समुदाहृतम्। पुराणं हिमवत्पृष्ठे तन्मे निगदतः शृणु ॥ ३३ ॥ वृषभध्वज भगवान् शंकरने हिमालयके शिखरपर मुनियोंसे जो पुरातन रहस्य बताया था, वह मेरे मुँहसे सुनो॥ ३३॥ यावत् तस्य भवेत् पुष्टिस्तेजो दीप्तिः पराक्रमः। प्रभावः सन्नतिर्जन्म कृष्णे तन्त्रिगुणं विभो ॥ ३४ ॥ विभो! अर्जुनमें जैसी पुष्टि है, जैसा तेज, दीप्ति, पराक्रम, प्रभाव, विनय और जन्मकी उत्तमता है, वह सब कुछ श्रीकृष्णमें अर्जुनसे तिगुना है॥ ३४॥ कः शक्नोत्यन्यथाकर्तुं तद् यदि स्यात् तथा शृणु। यत्र कृष्णो हि भगवांस्तत्र पुष्टिरनुत्तमा ॥ ३५ ॥ संसारमें कौन ऐसा है जो मेरे इस कथनको अन्यथा सिद्ध कर सके। श्रीकृष्णका जैसा प्रभाव है, उसे सुनो—जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वहाँ सर्वोत्तम पुष्टि विद्यमान है॥ ३५॥ वयं त्विहाल्पमतयः परतन्त्राः सुविक्कवाः। ज्ञानपूर्वं प्रपन्नाः स्मो मृत्योः पन्थानमव्ययम् ॥ ३६ ॥ हम इस जगत्में मन्दबुद्धि, परतन्त्र और व्याकुलचित्त मनुष्य हैं। हमने जान-बूझकर मृत्युके अटल मार्गपर पैर रखा है॥ ३६॥ भवांश्चाप्यार्जवपरः पूर्वं कृत्वा प्रतिश्रयम्। राजवृत्तं न लभते प्रतिज्ञापालने रतः ॥ ३७ ॥
युधिष्ठिर! तुम अत्यन्त सरल हो, इसीसे तुमने पहले ही भगवान् वासुदेवकी शरण ली और अपनी प्रतिज्ञाके पालनमें तत्पर रहकर राजोचित बर्तावको तुम ग्रहण नहीं कर रहे हो ।। ३७ ।। अप्येवात्मवधं लोके राजंस्त्वं बहु मन्यसे । न हि प्रतिज्ञा या दत्ता तां प्रहातुमरिंदम ॥ ३८ ॥ राजन्! तुम इस संसारमें अपनी हत्या कर लेनेको ही अधिक महत्त्व दे रहे हो। शत्रुदमन! जो प्रतिज्ञा तुमने कर ली है, उसे मिटा देना तुम्हारे लिये उचित नहीं है (तुमने शत्रुओंको जीतकर न्यायपूर्वक प्रजापालनका व्रत लिया है। अब शोकवश आत्महत्याका विचार मनमें लाकर तुम उस व्रतसे गिर रहे हो, यह ठीक नहीं है) ।। ३८ ।। कालेनायं जनः सर्वो निहतो रणमूर्धनि । वयं च कालेन हताः कालो हि परमेश्वरः ॥ ३९ ॥ ये सब राजालोग युद्धके मुहानेपर कालके द्वारा मारे गये हैं, हम भी कालसे ही मारे गये हैं; क्योंकि काल ही परमेश्वर है ।। ३९ ।। न हि कालेन कालज्ञः स्पृष्टः शोचितुमर्हसि । कालो लोहितरक्ताक्षः कृष्णो दण्डी सनातनः ॥ ४० ॥ जो कालके स्वरूपको जानता है, वह कालके थपेड़े खाकर भी शोक नहीं करता। श्रीकृष्ण ही लाल नेत्रोंवाले दण्डधारी सनातन काल हैं ।। ४० ।। तस्मात् कुन्तीसुत ज्ञातीन् नेह शोचितुमर्हसि । व्यपेतमन्युर्नित्यं त्वं भव कौरवनन्दन ॥ ४१ ॥ माधवस्यास्य माहात्म्यं श्रुतं यत् कथितं मया । तदेव तावत् पर्याप्तं सज्जनस्य निदर्शनम् ॥ ४२ ॥ अतः कुन्तीनन्दन! तुम्हें अपने भाई-बन्धुओं और सगे-सम्बन्धियोंके लिये यहाँ शोक नहीं करना चाहिये। कौरव-कुलका आनन्द बढ़ानेवाले युधिष्ठिर! तुम सदा क्रोधहीन एवं शान्त रहो। मैंने इन माधव श्रीकृष्णका माहात्म्य जैसा सुना था, वैसा कह सुनाया। इनकी महिमाको समझनेके लिये इतना ही पर्याप्त है। सज्जनके लिये दिग्दर्शन मात्र उपस्थित होता है ।। ४१-४२ ।। व्यासस्य वचनं श्रुत्वा नारदस्य च धीमतः । स्वयं चैव महाराज कृष्णस्यार्हतमस्य वै ॥ ४३ ॥ प्रभावश्चर्षिपूगस्य कथितः सुमहान् मया । महेश्वरस्य संवादं शैलपुत्र्याश्च भारत ॥ ४४ ॥ महाराज! व्यासजी तथा बुद्धिमान् नारदजीके वचन सुनकर मैंने परम पूज्य श्रीकृष्ण तथा महर्षियोंके महान् प्रभावका वर्णन किया है। भारत! गिरिराजनन्दिनी उमा और महेश्वरका जो संवाद हुआ था, उसका भी मैंने उल्लेख किया है ।। ४३-४४ ।।
धारयिष्यति यश्चैनं महापुरुषसम्भवम् । शृणुयात् कथयेद् वा यः स श्रेयो लभते परम् ।। ४५ ।। जो महापुरुष श्रीकृष्णके इस प्रभावको सुनेगा, कहेगा और याद रखेगा, उसको परम कल्याणकी प्राप्ति होगी ।। ४५ ।।
भवितारश्च तस्याथ सर्वे कामा यथेप्सिताः । प्रेत्य स्वर्गं च लभते नरो नास्त्यत्र संशयः ।। ४६ ।। उसके सारे अभीष्ट मनोरथ पूर्ण होंगे और वह मनुष्य मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोक पाता है, इसमें संशय नहीं है ।। ४६ ।।
न्याय्यं श्रेयोऽभिकामेन प्रतिपत्तुं जनार्दनः । एष एवाक्षयो विप्रैः स्तुतो राजन् जनार्दनः ।। ४७ ।। अतः जिसे कल्याणकी इच्छा हो, उस पुरुषको जनार्दनकी शरण लेनी चाहिये। राजन्! इन अविनाशी श्रीकृष्णकी ही ब्राह्मणोंने स्तुति की है ।। ४७ ।।
महेश्वरमुखोत्सृष्टा ये च धर्मगुणाः स्मृताः । ते त्वया मनसा धार्याः कुरुराज दिवानिशम् ।। ४८ ।। कुरुराज! भगवान् शंकरके मुखसे जो धर्म-सम्बन्धी गुण प्रतिपादित हुए हैं, उन सबको तुम्हें दिन-रात अपने हृदयमें धारण करना चाहिये ।। ४८ ।।
एवं ते वर्तमानस्य सम्यग्दण्डधरस्य च । प्रजापालनदक्षस्य स्वर्गलोको भविष्यति ।। ४९ ।। ऐसा बर्ताव करते हुए यदि तुम न्यायोचित रीतिसे दण्ड धारण करके प्रजापालनमें कुशलतापूर्वक लगे रहोगे तो तुम्हें स्वर्गलोक प्राप्त होगा ।। ४९ ।।
धर्मेणापि सदा राजन् प्रजा रक्षितुमर्हसि । यस्तस्य विपुलॊ दण्डः सम्यग्धर्मः स कीर्त्यते ।। ५० ।। राजन्! तुम धर्मपूर्वक सदा प्रजाकी रक्षा करते रहो। प्रजापालनके लिये जो दण्डका उचित उपयोग किया जाता है, वह धर्म ही कहलाता है ।। ५० ।।
य एष कथितो राजन् मया सज्जनसंनिधौ । शङ्करस्योमया सार्धं संवादो धर्मसंहितः ।। ५१ ।। नरेश्वर! भगवान् शंकरका पार्वतीजीके साथ जो धर्मविषयक संवाद हुआ था, उसे इन सत्पुरुषोंके निकट मैंने तुम्हें सुना दिया ।। ५१ ।।
श्रुत्वा वा श्रोतुकामो वाप्यर्चयेद् वृषभध्वजम् । विशुद्धेनेह भावेन य इच्छेद् भूतिमात्मनः ।। ५२ ।। जो अपना कल्याण चाहता हो, वह पुरुष यह संवाद सुनकर अथवा सुननेकी कामना रखकर विशुद्धभावसे भगवान् शंकरकी पूजा करे ।। ५२ ।।
एष तस्यानवद्यस्य नारदस्य महात्मनः ।
संदेशो देवपूजार्थं तं तथा कुरु पाण्डव ॥ ५३ ॥
पाण्डुनन्दन! उन अनिन्द्य महात्मा देवर्षि नारदजीका ही यह संदेश है कि महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये। इसलिये तुम भी ऐसा ही करो ॥ ५३ ॥
एतदत्यद्भुतं वृत्तं पुण्ये हि भवति प्रभो ।
वासुदेवस्य कौन्तेय स्थाणोश्चैव स्वभावजम् ॥ ५४ ॥
प्रभो! कुन्तीनन्दन! भगवान् श्रीकृष्ण और महादेवजीका यह अद्भुत एवं स्वाभाविक वृत्तान्त पूर्वकालमें पुण्यमय पर्वत हिमालयपर संघटित हुआ था ॥ ५४ ॥
दशवर्षसहस्राणि बदर्यामेष शाश्वतः ।
तपश्चचार विपुलं सह गाण्डीवधन्वना ॥ ५५ ॥
इन सनातन श्रीकृष्णने गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ (नर-नारायणरूपमें रहकर) बदरिकाश्रममें दस हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की थी ॥ ५५ ॥
त्रियुगौ पुण्डरीकाक्षौ वासुदेवधनञ्जयौ ।
विदितौ नारदादेतौ मम व्यासाच्च पार्थिव ॥ ५६ ॥
पृथ्वीनाथ! कमलनयन! श्रीकृष्ण और अर्जुन—ये दोनों सत्ययुग आदि तीनों युगोंमें प्रकट होनेके कारण त्रियुग कहलाते हैं। देवर्षि नारद तथा व्यासजीने इन दोनोंके स्वरूपका परिचय दिया था ॥ ५६ ॥
बाल एव महाबाहुश्चकार कदनं महत् ।
कंसस्य पुण्डरीकाक्षो ज्ञातित्राणार्थकारणात् ॥ ५७ ॥
महाबाहु कमलनयन श्रीकृष्णने बचपनमें ही अपने बन्धु-बान्धवोंकी रक्षाके लिये कंसका बड़ा भारी संहार किया था ॥ ५७ ॥
कर्मणामस्य कौन्तेय नान्तं संख्यातुमुत्सहे ।
शाश्वतस्य पुराणस्य पुरुषस्य युधिष्ठिर ॥ ५८ ॥
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर! इन सनातन पुराणपुरुष श्रीकृष्णके चरित्रोंकी कोई सीमा या संख्या नहीं बतायी जा सकती ॥ ५८ ॥
ध्रुवं श्रेयः परं तात भविष्यति तवोत्तमम् ।
यस्य ते पुरुषव्याघ्रः सखा चायं जनार्दनः ॥ ५९ ॥
तात! तुम्हारा तो अवश्य ही परम उत्तम कल्याण होगा; क्योंकि ये पुरुषसिंह जनार्दन तुम्हारे मित्र हैं ॥ ५९ ॥
दुर्योधनं तु शोचामि प्रेत्य लोकेऽपि दुर्मतिम् ।
यत्कृते पृथिवी सर्वा विनष्टा सहयद्विपा ॥ ६० ॥
दुर्बुद्धि दुर्योधन यद्यपि परलोकमें चला गया है, तो भी मुझे तो उसीके लिये अधिक शोक हो रहा है; क्योंकि उसीके कारण हाथी, घोड़े आदि वाहनोंसहित सारी पृथ्वीका नाश हुआ है ॥ ६० ॥
दुर्योधनापराधेन कर्णस्य शकुनेस्तथा ।
दुःशासनचतुर्थानां कुरवो निधनं गताः ॥ ६१ ॥
दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण और शकुनि—इन्हीं चारोंके अपराधसे सारे कौरव मारे गये हैं ॥ ६१ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं सम्भाषमाणे तु गाङ्गेये पुरुषर्षभे ।
तूष्णीं बभूव कौरव्यो मध्ये तेषां महात्मनाम् ॥ ६२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पुरुषप्रवर गंगानन्दन भीष्मजीके ऐसा कहनेपर उन महामनस्वी पुरुषोंके बीचमें बैठे हुए कुरुकुलकुमार युधिष्ठिर चुप हो गये ॥ ६२ ॥
तच्छ्रुत्वा विस्मयं जग्मुर्धृतराष्ट्रादयो नृपाः ।
सम्पूज्य मनसा कृष्णं सर्वे प्राञ्जलयोऽभवन् ॥ ६३ ॥
भीष्मजीकी बात सुनकर धृतराष्ट्र आदि राजाओंको बड़ा विस्मय हुआ और वे सभी मन-ही-मन श्रीकृष्णकी पूजा करते हुए उन्हें हाथ जोड़ने लगे ॥ ६३ ॥
ऋषयश्चापि ते सर्वे नारदप्रमुखास्तदा ।
प्रतिगृह्याभ्यनन्दन्त तद्वाक्यं प्रतिपूज्य च ॥ ६४ ॥
नारद आदि सम्पूर्ण महर्षि भी भीष्मजीके वचन सुनकर उनकी प्रशंसा करते हुए बहुत प्रसन्न हुए ॥ ६४ ॥
इत्येतदखिलं सर्वैः पाण्डवो भ्रातृभिः सह ।
श्रुतवान् सुमहाश्चर्यं पुण्यं भीष्मानुशासनम् ॥ ६५ ॥
इस प्रकार पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंके साथ यह भीष्मजीका सारा पवित्र अनुशासन सुना, जो अत्यन्त आश्चर्यजनक था ॥ ६५ ॥
युधिष्ठिरस्तु गाङ्गेयं विश्रान्तं भूरिदक्षिणम् ।
पुनरेव महाबुद्धिः पर्यपृच्छन्महीपतिः ॥ ६६ ॥
तदनन्तर बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंका दान करनेवाले गंगानन्दन भीष्मजी जब विश्राम ले चुके, तब महाबुद्धिमान् राजा युधिष्ठिर पुनः प्रश्न करने लगे ॥ ६६ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि महापुरुषप्रस्तावे
अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महापुरुष श्रीकृष्णकी प्रशंसाविषयक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४८ ॥
१४९-
एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्
(यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् ।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ।।
जिनके स्मरण करनेमात्रसे मनुष्य जन्म-मृत्यु-रूप संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है, सबकी उत्पत्तिके कारणभूत उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।।
नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते ।
अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥)
सम्पूर्ण प्राणियोंके आदिभूत, पृथ्वीको धारण करनेवाले, अनेक रूपधारी और सर्वसमर्थ भगवान् विष्णुको प्रणाम है ।।
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः ।
युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने सम्पूर्ण विधिरूप धर्म तथा पापोंका क्षय करनेवाले धर्म-रहस्योंको सब प्रकार सुनकर शान्तनुपुत्र भीष्मसे फिर पूछा ।। १ ।।
युधिष्ठिर उवाच
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ।। २ ।।
युधिष्ठिर बोले— दादाजी! समस्त जगत्में एक ही देव कौन है तथा इस लोकमें एक ही परम आश्रयस्थान कौन है? किस देवकी स्तुति—गुण-कीर्तन करनेसे तथा किस देवका नाना प्रकारसे बाह्य और आन्तरिक पूजन करनेसे मनुष्य कल्याणकी प्राप्ति कर सकते हैं? ।। २ ।।
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
किं जपन् मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ।। ३ ।।
आप समस्त धर्मोंमें किस धर्मको परम श्रेष्ठ मानते हैं? तथा किसका जप करनेसे जीव जन्म-मरणरूप संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है? ।। ३ ।।
भीष्म उवाच
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ ४ ॥ भीष्मजीने कहा—बेटा! स्थावर-जंगमरूप संसारके स्वामी, ब्रह्मादि देवोंके देव, देश-काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्न, क्षर-अक्षरसे श्रेष्ठ पुरुषोत्तमका सहस्रनामोंके द्वारा निरन्तर तत्पर रहकर गुण-संकीर्तन करनेसे पुरुष सब दुःखोंसे पार हो जाता है ॥ ४ ॥
तमेव चार्चयन् नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ ५ ॥ तथा उसी विनाशरहित पुरुषका सब समय भक्तिसे युक्त होकर पूजन करनेसे, उसीका ध्यान करनेसे तथा स्तवन एवं नमस्कार करनेसे पूजा करनेवाला सब दुःखोंसे छूट जाता है ॥ ५ ॥
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । लोकाध्यक्षं स्तुवन् नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ ६ ॥ उस जन्म-मृत्यु आदि छः भाव-विकारोंसे रहित, सर्वव्यापक, सम्पूर्ण लोकोंके महेश्वर, लोकाध्यक्ष देवकी निरन्तर स्तुति करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे पार हो जाता है ॥ ६ ॥
ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् । लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ ७ ॥ ब्राह्मणोंके हितकारी, सब धर्मोंको जाननेवाले, प्राणियोंकी कीर्तिको बढ़ानेवाले, सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी, समस्त भूतोंके उत्पत्ति-स्थान एवं संसारके कारणरूप परमेश्वरका स्तवन करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे छूट जाता है ॥ ७ ॥
एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ ८ ॥ सम्पूर्ण धर्मोंमें मैं इसी धर्मको सबसे बड़ा मानता हूँ कि मनुष्य कमलनयन भगवान् वासुदेवका भक्तिपूर्वक गुण-संकीर्तनरूप स्तुतियोंसे सदा अर्चन करे ॥ ८ ॥
परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ ९ ॥ पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् । दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १० ॥ यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे । यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ ११ ॥ तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते । विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥ १२ ॥ पृथ्वीपते! जो परम महान् तेजःस्वरूप है, जो परम महान् तपःस्वरूप है, जो परम महान् ब्रह्म है, जो सबका परम आश्रय है, जो पवित्र करनेवाले तीर्थादिकोंमें परम पवित्र है, मंगलोंका भी मंगल है, देवोंका भी देव है तथा जो भूतप्राणियोंका अविनाशी पिता है,
कल्पके आदिमें जिससे सम्पूर्ण भूत उत्पन्न होते हैं और फिर युगका क्षय होनेपर महाप्रलयमें जिसमें वे विलीन हो जाते हैं, उस लोकप्रधान, संसारके स्वामी, भगवान् विष्णुके हजार नामोंको मुझसे सुनो, जो पाप और संसार-भयको दूर करनेवाले हैं ॥ ९—१२ ॥
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १३ ॥
महान् आत्मस्वरूप विष्णुके जो नाम गुणके कारण प्रवृत्त हुए हैं, उनमेंसे जो-जो प्रसिद्ध हैं और मन्त्रद्रष्टा मुनियोंद्वारा जो सर्वत्र गाये गये हैं, उन समस्त नामोंको पुरुषार्थ-सिद्धिके लिये वर्णन करता हूँ ॥ १३ ॥
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद् भूतभृद् भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १४ ॥
ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, १ विश्वम्-विराट्स्वरूप, २ विष्णुः-सर्वव्यापी, ३ वषट्कारः-जिनके उद्देश्यसे यज्ञमें वषट् क्रिया की जाती है, ऐसे यज्ञस्वरूप, ४ भूतभव्यभवत्प्रभुः-भूत, भविष्यत् और वर्तमानके स्वामी, ५ भूतकृत्-रजोगुणको स्वीकार करके ब्रह्मारूपसे सम्पूर्ण भूतोंकी रचना करनेवाले, ६ भूतभृत्-सत्त्वगुणको स्वीकार करके सम्पूर्ण भूतोंका पालन-पोषण करनेवाले, ७ भावः-नित्यस्वरूप होते हुए भी स्वतः उत्पन्न होनेवाले, ८ भूतात्मा-सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा, ९ भूतभावनः-भूतोंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाले ॥ १४ ॥
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ १५ ॥
१० पूतात्मा-पवित्रात्मा, ११ परमात्मा-परमश्रेष्ठ नित्यशुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव, १२ मुक्तानां परमा गतिः-मुक्त पुरुषोंकी सर्वश्रेष्ठ गतिस्वरूप, १३ अव्ययः-कभी विनाशको प्राप्त न होनेवाले, १४ पुरुषः-पुर अर्थात् शरीरमें शयन करनेवाले, १५ साक्षी-बिना किसी व्यवधानके सब कुछ देखनेवाले, १६ क्षेत्रज्ञः-क्षेत्र अर्थात् समस्त प्रकृतिरूप शरीरको पूर्णतया जाननेवाले, १७ अक्षरः-कभी क्षीण न होनेवाले ॥ १५ ॥
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ १६ ॥
१८ योगः-मनसहित सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियोंके निरोधरूप योगसे प्राप्त होनेवाले, १९ योगविदां नेता-योगको जाननेवाले भक्तोंके स्वामी, २० प्रधानपुरुषेश्वरः-प्रकृति और पुरुषके स्वामी, २१ नारसिंहवपुः-मनुष्य और सिंह दोनोंके-जैसा शरीर धारण करनेवाले नरसिंहरूप, २२ श्रीमान्-वक्षःस्थलमें सदा श्रीको धारण करनेवाले, २३ केशवः-(क) ब्रह्मा, (अ) विष्णु और (ईश) महादेव—इस प्रकार त्रिमूर्तिस्वरूप, २४ पुरुषोत्तमः-क्षर और अक्षर—इन दोनोंसे सर्वथा उत्तम ॥ १६ ॥
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः । सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ १७ ॥ २५ सर्वः-सर्वरूप, २६ शर्वः-सारी प्रजाका प्रलयकालमें संहार करनेवाले, २७ शिवः-तीनों गुणोंसे परे कल्याणस्वरूप, २८ स्थाणुः-स्थिर, २९ भूतादिः-भूतोंके आदिकारण, ३० निधिरव्ययः-प्रलयकालमें सब प्राणियोंके लीन होनेके लिये अविनाशी स्थानरूप, ३१ सम्भवः-अपनी इच्छासे भली प्रकार प्रकट होनेवाले, ३२ भावनः-समस्त भोक्ताओंके फलोंको उत्पन्न करनेवाले, ३३ भर्ता-सबका भरण करनेवाले, ३४ प्रभवः-उत्कृष्ट (दिव्य) जन्मवाले, ३५ प्रभुः-सबके स्वामी, ३६ ईश्वरः- उपाधिरहित ऐश्वर्यवाले ॥ १७ ॥
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः । अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ १८ ॥ ३७ स्वयम्भूः-स्वयं उत्पन्न होनेवाले, ३८ शम्भुः-भक्तोंके लिये सुख उत्पन्न करनेवाले, ३९ आदित्यः-द्वादश आदित्योंमें विष्णुनामक आदित्य, ४० पुष्कराक्षः-कमलके समान नेत्रवाले, ४१ महास्वनः-वेदरूप अत्यन्त महान् घोषवाले, ४२ अनादिनिधनः-जन्म-मृत्युसे रहित, ४३ धाता-विश्वको धारण करनेवाले, ४४ विधाता-कर्म और उसके फलोंकी रचना करनेवाले, ४५ धातुरुत्तमः-कार्य-कारणरूप सम्पूर्ण प्रपंचको धारण करनेवाले एवं सर्वश्रेष्ठ ॥ १८ ॥
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ १९ ॥ ४६ अप्रमेयः-प्रमाणादिसे जाननेमें न आ सकनेवाले, ४७ हृषीकेशः-इन्द्रियोंके स्वामी, ४८ पद्मनाभः-जगत्के कारणरूप कमलको अपनी नाभिमें स्थान देनेवाले, ४९ अमरप्रभुः-देवताओंके स्वामी, ५० विश्वकर्मा-सारे जगत्की रचना करनेवाले, ५१ मनुः-प्रजापति मनुरूप, ५२ त्वष्टा-संहारके समय सम्पूर्ण प्राणियोंको क्षीण करनेवाले, ५३ स्थविष्ठः-अत्यन्त स्थूल, ५४ स्थविरो ध्रुवः-अति प्राचीन एवं अत्यन्त स्थिर ॥ १९ ॥
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः । प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ २० ॥ ५५ अग्राह्यः-मनसे भी ग्रहण न किये जा सकनेवाले, ५६ शाश्वतः-सब कालमें स्थित रहनेवाले, ५७ कृष्णः-सबके चित्तको बलात् अपनी ओर आकर्षित करनेवाले परमानन्दस्वरूप, ५८ लोहिताक्षः-लाल नेत्रोंवाले, ५९ प्रतर्दनः-प्रलयकालमें प्राणियोंका संहार करनेवाले, ६० प्रभूतः-ज्ञान, ऐश्वर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न, ६१ त्रिककुब्धाम-ऊपर-नीचे और मध्यभेदवाली तीनों दिशाओंके आश्रयरूप, ६२ पवित्रम्-सबको पवित्र करनेवाले, ६३ मङ्गलं परम्-परम मंगलस्वरूप ॥ २० ॥
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ २१ ॥
६४ ईशानः-सर्वभूतोंके नियन्ता, ६५ प्राणदः-सबके प्राणदाता, ६६ प्राणः-
प्राणस्वरूप, ६७ ज्येष्ठः-सबके कारण होनेसे सबसे बड़े, ६८ श्रेष्ठः-सबमें उत्कृष्ट होनेसे
परम श्रेष्ठ, ६९ प्रजापतिः- ईश्वररूपसे सारी प्रजाओंके स्वामी, ७० हिरण्यगर्भः-
ब्रह्माण्डरूप हिरण्यमय अण्डके भीतर ब्रह्मारूपसे व्याप्त होनेवाले, ७१ भूगर्भः-पृथ्वीको
गर्भमें रखनेवाले, ७२ माधवः-लक्ष्मीके पति, ७३ मधुसूदनः-मधुनामक दैत्यको
मारनेवाले ।। २१ ।।
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ।। २२ ।।
७४ ईश्वरः-सर्वशक्तिमान् ईश्वर, ७५ विक्रमी-शूरवीरतासे युक्त, ७६ धन्वी-शार्ङ्गधनुष
रखनेवाले, ७७ मेधावी-अतिशय बुद्धिमान्, ७८ विक्रमः-गरुड़ पक्षीद्वारा गमन करनेवाले,
७९ क्रमः-क्रमविस्तारके कारण, ८० अनुत्तमः-सर्वोत्कृष्ट, ८१ दुराधर्षः-किसीसे भी
तिरस्कृत न हो सकनेवाले, ८२ कृतज्ञः-अपने निमित्तसे थोड़ा-सा भी त्याग किये जानेपर
उसे बहुत माननेवाले यानि पत्र-पुष्पादि थोड़ी-सी वस्तु समर्पण करनेवालोंको भी मोक्ष दे
देनेवाले, ८३ कृतिः-पुरुष-प्रयत्नके आधाररूप, ८४ आत्मवान्-अपनी ही महिमामें
स्थित ।। २२ ।।
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ।। २३ ।।
८५ सुरेशः-देवताओंके स्वामी, ८६ शरणम्-दीन-दुखियोंके परम आश्रय, ८७ शर्म-
परमानन्दस्वरूप, ८८ विश्वरेताः-विश्वके कारण, ८९ प्रजाभवः-सारी प्रजाको उत्पन्न
करनेवाले, ९० अहः-प्रकाशरूप, ९१ संवत्सरः-कालरूपसे स्थित, ९२ व्यालः-
शेषनागस्वरूप, ९३ प्रत्ययः-उत्तम बुद्धिसे जाननेमें आनेवाले, ९४ सर्वदर्शनः-सबके
द्रष्टा ।। २३ ।।
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ।। २४ ।।
९५ अजः-जन्मरहित, ९६ सर्वेश्वरः-समस्त ईश्वरोंके भी ईश्वर, ९७ सिद्धः-नित्यसिद्ध,
९८ सिद्धिः-सबके फलस्वरूप, ९९ सर्वादिः-सब भूतोंके आदि कारण, १०० अच्युतः-
अपनी स्वरूप-स्थितिसे कभी त्रिकालमें भी च्युत न होनेवाले, १०१ वृषाकपिः-धर्म और
वराहरूप, १०२ अमेयात्मा-अप्रमेयस्वरूप, १०३ सर्वयोगविनिःसृतः-नाना प्रकारके
शास्त्रोक्त साधनोंसे जाननेमें आनेवाले ।। २४ ।।
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मासम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ।। २५ ।।
१०४ वसुः-सब भूतोंके वासस्थान, १०५ वसुमनाः-उदार मनवाले, १०६ सत्यः-
सत्यस्वरूप, १०७ समात्मा-सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक आत्मारूपसे विराजनेवाले, १०८