भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1413, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1413

आज वह दुर्योधन अपने पुत्र, भाई और सम्बन्धियोंसहित शोकका विषय हो गया है; क्योंकि उस मूर्खने क्रोधके आवेशमें आकर श्रीकृष्ण और अर्जुनसे युद्ध ठाना था॥ २९॥ दैतेया दानवेन्द्राश्च महाकाया महाबलाः। चक्राग्नौ क्षयमापन्ना दावाग्नौ शलभा इव ॥ ३० ॥ कितने ही विशाल शरीरवाले महाबली दैत्य और दानव दावानलमें दग्ध होनेवाले पतंगोंकी तरह श्रीकृष्णकी चक्राग्निमें स्वाहा हो चुके हैं॥ ३०॥ प्रतियोद्धुं न शक्यो हि मानुषैरेष संयुगे। विहीनैः पुरुषव्याघ्र सत्त्वशक्तिबलादिभिः ॥ ३१ ॥ पुरुषसिंह! सत्त्व (धैर्य), शक्ति और बल आदिसे स्वभावतः हीन मनुष्य युद्धमें इन श्रीकृष्णका सामना नहीं कर सकते॥ ३१॥ जयो योगी युगान्ताभः सव्यसाची रणाग्रगः। तेजसा हतवान् सर्वं सुयोधनबलं नृप ॥ ३२ ॥ अर्जुन भी योगशक्तिसे सम्पन्न और युगान्तकालकी अग्निके समान तेजस्वी हैं। ये बायें हाथसे भी बाण चलाते हैं और रणभूमिमें सबसे आगे रहते हैं। नरेश्वर! इन्होंने अपने तेजसे दुर्योधनकी सारी सेनाका संहार कर डाला है॥ ३२॥ यत् तु गोवृषभांकेन मुनिभ्यः समुदाहृतम्। पुराणं हिमवत्पृष्ठे तन्मे निगदतः शृणु ॥ ३३ ॥ वृषभध्वज भगवान् शंकरने हिमालयके शिखरपर मुनियोंसे जो पुरातन रहस्य बताया था, वह मेरे मुँहसे सुनो॥ ३३॥ यावत् तस्य भवेत् पुष्टिस्तेजो दीप्तिः पराक्रमः। प्रभावः सन्नतिर्जन्म कृष्णे तन्त्रिगुणं विभो ॥ ३४ ॥ विभो! अर्जुनमें जैसी पुष्टि है, जैसा तेज, दीप्ति, पराक्रम, प्रभाव, विनय और जन्मकी उत्तमता है, वह सब कुछ श्रीकृष्णमें अर्जुनसे तिगुना है॥ ३४॥ कः शक्नोत्यन्यथाकर्तुं तद् यदि स्यात् तथा शृणु। यत्र कृष्णो हि भगवांस्तत्र पुष्टिरनुत्तमा ॥ ३५ ॥ संसारमें कौन ऐसा है जो मेरे इस कथनको अन्यथा सिद्ध कर सके। श्रीकृष्णका जैसा प्रभाव है, उसे सुनो—जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वहाँ सर्वोत्तम पुष्टि विद्यमान है॥ ३५॥ वयं त्विहाल्पमतयः परतन्त्राः सुविक्कवाः। ज्ञानपूर्वं प्रपन्नाः स्मो मृत्योः पन्थानमव्ययम् ॥ ३६ ॥ हम इस जगत्में मन्दबुद्धि, परतन्त्र और व्याकुलचित्त मनुष्य हैं। हमने जान-बूझकर मृत्युके अटल मार्गपर पैर रखा है॥ ३६॥ भवांश्चाप्यार्जवपरः पूर्वं कृत्वा प्रतिश्रयम्। राजवृत्तं न लभते प्रतिज्ञापालने रतः ॥ ३७ ॥