भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1412, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1412

नरेश्वर! जो सम्पूर्ण प्राणियोंके मानसिक संकल्पमें व्याप्त रहनेवाला है और देवताओं तथा असुरोंके भी अन्तःकरणमें सदा विचरता रहता है, वह कामदेव ही भगवान् श्रीकृष्णका वंशधर है ॥ २१ ॥

सोऽयं पुरुषशार्दूलो मेघवर्णश्चतुर्भुजः । संश्रितःपाण्डवान् प्रेम्णा भवन्तश्चैनमाश्रिताः ॥ २२ ॥ वे ही ये चार भुजाधारी घनश्याम पुरुषसिंह श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक तुम पाण्डवोंके आश्रित हैं और तुमलोग भी इनके शरणागत हो ॥ २२ ॥

कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिश्चैव स्वर्गमार्गस्तथैव च । यत्रैष संस्थितस्तत्र देवो विष्णुस्त्रिविक्रमः ॥ २३ ॥ ये त्रिविक्रम विष्णुदेव जहाँ विद्यमान हैं, वहीं कीर्ति, लक्ष्मी, धृति तथा स्वर्गका मार्ग है ॥ २३ ॥

सेन्द्रा देवास्त्रयस्त्रिंशदेष नात्र विचारणा । आदिदेवो महादेवः सर्वभूतप्रतिश्रयः ॥ २४ ॥ इन्द्र आदि तैंतीस देवता इन्हींके स्वरूप हैं, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। ये ही सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले आदिदेव महादेव हैं ॥ २४ ॥

अनादिनिधनोऽव्यक्तो महात्मा मधुसूदनः । अयं जातो महातेजाः सुराणामर्थसिद्धये ॥ २५ ॥ इनका न आदि है न अन्त। ये अव्यक्तस्वरूप, महातेजस्वी महात्मा मधुसूदन देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये यदुकुलमें उत्पन्न हुए हैं ॥ २५ ॥

सुदुस्तरार्थतत्त्वस्य वक्ता कर्ता च माधवः । तव पार्थ जयः कृत्स्नस्तव कीर्तिस्तथातुला ॥ २६ ॥ तवेयं पृथिवी देवी कृत्स्ना नारायणाश्रयात् । अयं नाथस्तवाचिन्त्यो यस्य नारायणो गतिः ॥ २७ ॥ ये माधव दुर्बोध तत्त्वके वक्ता और कर्ता हैं। कुन्तीनन्दन! तुम्हारी सम्पूर्ण विजय, अनुपम कीर्ति और अखिल भूमण्डलका राज्य—ये सब भगवान् नारायणका आश्रय लेनेसे ही तुम्हें प्राप्त हुए हैं। ये अचिन्त्यस्वरूप नारायण ही तुम्हारे रक्षक और परमगति हैं ॥ २६-२७ ॥

स भवांस्त्वमुपाध्वर्यू रणाग्नौ हुतवान् नृपान् । कृष्णस्रुवेण महता युगान्ताग्निसमेन वै ॥ २८ ॥ तुमने स्वयं होता बनकर प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी श्रीकृष्णरूपी विशाल स्रुवाके द्वारा समराग्निकी ज्वालामें सम्पूर्ण राजाओंकी आहुति दे डाली है ॥ २८ ॥

दुर्योधनश्च शोच्योऽसौ सपुत्रभ्रातृबान्धवः । कृतवान् योऽबुद्धिः क्रोधाद्धरिगाण्डीविविग्रहम् ॥ २९ ॥