महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुधिष्ठिर! तुम अत्यन्त सरल हो, इसीसे तुमने पहले ही भगवान् वासुदेवकी शरण ली और अपनी प्रतिज्ञाके पालनमें तत्पर रहकर राजोचित बर्तावको तुम ग्रहण नहीं कर रहे हो ।। ३७ ।। अप्येवात्मवधं लोके राजंस्त्वं बहु मन्यसे । न हि प्रतिज्ञा या दत्ता तां प्रहातुमरिंदम ॥ ३८ ॥ राजन्! तुम इस संसारमें अपनी हत्या कर लेनेको ही अधिक महत्त्व दे रहे हो। शत्रुदमन! जो प्रतिज्ञा तुमने कर ली है, उसे मिटा देना तुम्हारे लिये उचित नहीं है (तुमने शत्रुओंको जीतकर न्यायपूर्वक प्रजापालनका व्रत लिया है। अब शोकवश आत्महत्याका विचार मनमें लाकर तुम उस व्रतसे गिर रहे हो, यह ठीक नहीं है) ।। ३८ ।। कालेनायं जनः सर्वो निहतो रणमूर्धनि । वयं च कालेन हताः कालो हि परमेश्वरः ॥ ३९ ॥ ये सब राजालोग युद्धके मुहानेपर कालके द्वारा मारे गये हैं, हम भी कालसे ही मारे गये हैं; क्योंकि काल ही परमेश्वर है ।। ३९ ।। न हि कालेन कालज्ञः स्पृष्टः शोचितुमर्हसि । कालो लोहितरक्ताक्षः कृष्णो दण्डी सनातनः ॥ ४० ॥ जो कालके स्वरूपको जानता है, वह कालके थपेड़े खाकर भी शोक नहीं करता। श्रीकृष्ण ही लाल नेत्रोंवाले दण्डधारी सनातन काल हैं ।। ४० ।। तस्मात् कुन्तीसुत ज्ञातीन् नेह शोचितुमर्हसि । व्यपेतमन्युर्नित्यं त्वं भव कौरवनन्दन ॥ ४१ ॥ माधवस्यास्य माहात्म्यं श्रुतं यत् कथितं मया । तदेव तावत् पर्याप्तं सज्जनस्य निदर्शनम् ॥ ४२ ॥ अतः कुन्तीनन्दन! तुम्हें अपने भाई-बन्धुओं और सगे-सम्बन्धियोंके लिये यहाँ शोक नहीं करना चाहिये। कौरव-कुलका आनन्द बढ़ानेवाले युधिष्ठिर! तुम सदा क्रोधहीन एवं शान्त रहो। मैंने इन माधव श्रीकृष्णका माहात्म्य जैसा सुना था, वैसा कह सुनाया। इनकी महिमाको समझनेके लिये इतना ही पर्याप्त है। सज्जनके लिये दिग्दर्शन मात्र उपस्थित होता है ।। ४१-४२ ।। व्यासस्य वचनं श्रुत्वा नारदस्य च धीमतः । स्वयं चैव महाराज कृष्णस्यार्हतमस्य वै ॥ ४३ ॥ प्रभावश्चर्षिपूगस्य कथितः सुमहान् मया । महेश्वरस्य संवादं शैलपुत्र्याश्च भारत ॥ ४४ ॥ महाराज! व्यासजी तथा बुद्धिमान् नारदजीके वचन सुनकर मैंने परम पूज्य श्रीकृष्ण तथा महर्षियोंके महान् प्रभावका वर्णन किया है। भारत! गिरिराजनन्दिनी उमा और महेश्वरका जो संवाद हुआ था, उसका भी मैंने उल्लेख किया है ।। ४३-४४ ।।