महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1422, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ ईशानः-सर्वभूतोंके नियन्ता, ६५ प्राणदः-सबके प्राणदाता, ६६ प्राणः-
प्राणस्वरूप, ६७ ज्येष्ठः-सबके कारण होनेसे सबसे बड़े, ६८ श्रेष्ठः-सबमें उत्कृष्ट होनेसे
परम श्रेष्ठ, ६९ प्रजापतिः- ईश्वररूपसे सारी प्रजाओंके स्वामी, ७० हिरण्यगर्भः-
ब्रह्माण्डरूप हिरण्यमय अण्डके भीतर ब्रह्मारूपसे व्याप्त होनेवाले, ७१ भूगर्भः-पृथ्वीको
गर्भमें रखनेवाले, ७२ माधवः-लक्ष्मीके पति, ७३ मधुसूदनः-मधुनामक दैत्यको
मारनेवाले ।। २१ ।।
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ।। २२ ।।
७४ ईश्वरः-सर्वशक्तिमान् ईश्वर, ७५ विक्रमी-शूरवीरतासे युक्त, ७६ धन्वी-शार्ङ्गधनुष
रखनेवाले, ७७ मेधावी-अतिशय बुद्धिमान्, ७८ विक्रमः-गरुड़ पक्षीद्वारा गमन करनेवाले,
७९ क्रमः-क्रमविस्तारके कारण, ८० अनुत्तमः-सर्वोत्कृष्ट, ८१ दुराधर्षः-किसीसे भी
तिरस्कृत न हो सकनेवाले, ८२ कृतज्ञः-अपने निमित्तसे थोड़ा-सा भी त्याग किये जानेपर
उसे बहुत माननेवाले यानि पत्र-पुष्पादि थोड़ी-सी वस्तु समर्पण करनेवालोंको भी मोक्ष दे
देनेवाले, ८३ कृतिः-पुरुष-प्रयत्नके आधाररूप, ८४ आत्मवान्-अपनी ही महिमामें
स्थित ।। २२ ।।
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ।। २३ ।।
८५ सुरेशः-देवताओंके स्वामी, ८६ शरणम्-दीन-दुखियोंके परम आश्रय, ८७ शर्म-
परमानन्दस्वरूप, ८८ विश्वरेताः-विश्वके कारण, ८९ प्रजाभवः-सारी प्रजाको उत्पन्न
करनेवाले, ९० अहः-प्रकाशरूप, ९१ संवत्सरः-कालरूपसे स्थित, ९२ व्यालः-
शेषनागस्वरूप, ९३ प्रत्ययः-उत्तम बुद्धिसे जाननेमें आनेवाले, ९४ सर्वदर्शनः-सबके
द्रष्टा ।। २३ ।।
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ।। २४ ।।
९५ अजः-जन्मरहित, ९६ सर्वेश्वरः-समस्त ईश्वरोंके भी ईश्वर, ९७ सिद्धः-नित्यसिद्ध,
९८ सिद्धिः-सबके फलस्वरूप, ९९ सर्वादिः-सब भूतोंके आदि कारण, १०० अच्युतः-
अपनी स्वरूप-स्थितिसे कभी त्रिकालमें भी च्युत न होनेवाले, १०१ वृषाकपिः-धर्म और
वराहरूप, १०२ अमेयात्मा-अप्रमेयस्वरूप, १०३ सर्वयोगविनिःसृतः-नाना प्रकारके
शास्त्रोक्त साधनोंसे जाननेमें आनेवाले ।। २४ ।।
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मासम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ।। २५ ।।
१०४ वसुः-सब भूतोंके वासस्थान, १०५ वसुमनाः-उदार मनवाले, १०६ सत्यः-
सत्यस्वरूप, १०७ समात्मा-सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक आत्मारूपसे विराजनेवाले, १०८