महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1421, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः । सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ १७ ॥ २५ सर्वः-सर्वरूप, २६ शर्वः-सारी प्रजाका प्रलयकालमें संहार करनेवाले, २७ शिवः-तीनों गुणोंसे परे कल्याणस्वरूप, २८ स्थाणुः-स्थिर, २९ भूतादिः-भूतोंके आदिकारण, ३० निधिरव्ययः-प्रलयकालमें सब प्राणियोंके लीन होनेके लिये अविनाशी स्थानरूप, ३१ सम्भवः-अपनी इच्छासे भली प्रकार प्रकट होनेवाले, ३२ भावनः-समस्त भोक्ताओंके फलोंको उत्पन्न करनेवाले, ३३ भर्ता-सबका भरण करनेवाले, ३४ प्रभवः-उत्कृष्ट (दिव्य) जन्मवाले, ३५ प्रभुः-सबके स्वामी, ३६ ईश्वरः- उपाधिरहित ऐश्वर्यवाले ॥ १७ ॥
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः । अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ १८ ॥ ३७ स्वयम्भूः-स्वयं उत्पन्न होनेवाले, ३८ शम्भुः-भक्तोंके लिये सुख उत्पन्न करनेवाले, ३९ आदित्यः-द्वादश आदित्योंमें विष्णुनामक आदित्य, ४० पुष्कराक्षः-कमलके समान नेत्रवाले, ४१ महास्वनः-वेदरूप अत्यन्त महान् घोषवाले, ४२ अनादिनिधनः-जन्म-मृत्युसे रहित, ४३ धाता-विश्वको धारण करनेवाले, ४४ विधाता-कर्म और उसके फलोंकी रचना करनेवाले, ४५ धातुरुत्तमः-कार्य-कारणरूप सम्पूर्ण प्रपंचको धारण करनेवाले एवं सर्वश्रेष्ठ ॥ १८ ॥
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ १९ ॥ ४६ अप्रमेयः-प्रमाणादिसे जाननेमें न आ सकनेवाले, ४७ हृषीकेशः-इन्द्रियोंके स्वामी, ४८ पद्मनाभः-जगत्के कारणरूप कमलको अपनी नाभिमें स्थान देनेवाले, ४९ अमरप्रभुः-देवताओंके स्वामी, ५० विश्वकर्मा-सारे जगत्की रचना करनेवाले, ५१ मनुः-प्रजापति मनुरूप, ५२ त्वष्टा-संहारके समय सम्पूर्ण प्राणियोंको क्षीण करनेवाले, ५३ स्थविष्ठः-अत्यन्त स्थूल, ५४ स्थविरो ध्रुवः-अति प्राचीन एवं अत्यन्त स्थिर ॥ १९ ॥
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः । प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ २० ॥ ५५ अग्राह्यः-मनसे भी ग्रहण न किये जा सकनेवाले, ५६ शाश्वतः-सब कालमें स्थित रहनेवाले, ५७ कृष्णः-सबके चित्तको बलात् अपनी ओर आकर्षित करनेवाले परमानन्दस्वरूप, ५८ लोहिताक्षः-लाल नेत्रोंवाले, ५९ प्रतर्दनः-प्रलयकालमें प्राणियोंका संहार करनेवाले, ६० प्रभूतः-ज्ञान, ऐश्वर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न, ६१ त्रिककुब्धाम-ऊपर-नीचे और मध्यभेदवाली तीनों दिशाओंके आश्रयरूप, ६२ पवित्रम्-सबको पवित्र करनेवाले, ६३ मङ्गलं परम्-परम मंगलस्वरूप ॥ २० ॥
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ २१ ॥