महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1423, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअसम्मितः-समस्त पदार्थोंसे मापे न जा सकनेवाले, १०९ समः-सब समय समस्त विकारोंसे रहित, ११० अमोघः-भक्तोंके द्वारा पूजन, स्तवन अथवा स्मरण किये जानेपर उन्हें वृथा न करके पूर्णरूपसे उनका फल प्रदान करनेवाले, १११ पुण्डरीकाक्षः-कमलके समान नेत्रोंवाले, ११२ वृषकर्मा-धर्ममय कर्म करनेवाले, ११३ वृषाकृतिः-धर्मकी स्थापना करनेके लिये विग्रह धारण करनेवाले ।। २५ ।।
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुविश्वयोनिः शुचिश्रवाः । अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ।। २६ ।।
११४ रुद्रः-दुःखके कारणको दूर भगा देनेवाले, ११५ बहुशिराः-बहुत-से सिरोंवाले, ११६ बभ्रुः-लोकोंका भरण करनेवाले, ११७ विश्वयोनिः-विश्वको उत्पन्न करनेवाले, ११८ शुचिश्रवाः-पवित्र कीर्तिवाले, ११९ अमृतः-कभी न मरनेवाले, १२० शाश्वतस्थाणुः-नित्य सदा एकरस रहनेवाले एवं स्थिर, १२१ वरारोहः-आरूढ़ होनेके लिये परम उत्तम अपुनरावृत्तिस्थानरूप, १२२ महातपाः-प्रताप (प्रभाव) रूप महान् तपवाले ।। २६ ।।
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ।। २७ ।।
१२३ सर्वगः-कारणरूपसे सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले, १२४ सर्वविद्भानुः-सब कुछ जाननेवाले प्रकाशरूप, १२५ विष्वक्सेनः-युद्धके लिये की हुई तैयारीमात्रसे ही दैत्यसेनाको तितर-बितर कर डालनेवाले, १२६ जनार्दनः-भक्तोंके द्वारा अभ्युदयनिःश्रेयसरूप परम पुरुषार्थकी याचना किये जानेवाले, १२७ वेदः-वेदरूप, १२८ वेदवित्-वेद तथा वेदके अर्थको यथावत् जाननेवाले, १२९ अव्यङ्गः-ज्ञानादिसे परिपूर्ण अर्थात् किसी प्रकार अधूरे न रहनेवाले सर्वांगपूर्ण, १३० वेदाङ्गः-वेदरूप अंगोंवाले, १३१ वेदवित्-वेदोंको विचारनेवाले, १३२ कविः-सर्वज्ञ ।। २७ ।।
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः । चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ।। २८ ।।
१३३ लोकाध्यक्षः-समस्त लोकोंके अधिपति, १३४ सुराध्यक्षः-देवताओंके अध्यक्ष, १३५ धर्माध्यक्षः-अनुरूप फल देनेके लिये धर्म और अधर्मका निर्णय करनेवाले, १३६ कृताकृतः-कार्यरूपसे कृत और कारणरूपसे अकृत, १३७ चतुरात्मा-ब्रह्मा, विष्णु, महेश और निराकार ब्रह्म—इन चार स्वरूपोंवाले, १३८ चतुर्व्यूहः-उत्पत्ति, स्थिति, नाश और रक्षारूप चार व्यूहवाले, १३९ चतुर्दंष्ट्रः-चार दाढ़ोंवाले नरसिंहरूप, १४० चतुर्भुजः-चार भुजाओंवाले, वैकुण्ठवासी भगवान् विष्णु ।। २८ ।।
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ।। २९ ।।
१४१ भ्राजिष्णुः-एकरस प्रकाशस्वरूप, १४२ भोजनम्-ज्ञानियोंद्वारा भोगनेयोग्य अमृतस्वरूप, १४३ भोक्ता-पुरुषरूपसे भोक्ता, १४४ सहिष्णुः-सहनशील, १४५