महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1407, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंहम सब देवता उनके श्रीविग्रहमें निवास करते हैं। अतः उनका दर्शन करनेसे तीनों देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु और शिव)-का दर्शन हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ।। ५३ ।। तस्य चैवाग्रजो भ्राता सिताद्रिनिचयप्रभः । हली बल इति ख्यातो भविष्यति धराधरः ।। ५४ ।। उनके बड़े भाई कैलासकी पर्वतमालाओंके समान श्वेत कान्तिसे प्रकाशित होनेवाले हलधर और बलरामके नामसे विख्यात होंगे। पृथ्वीको धारण करनेवाले शेषनाग ही बलरामके रूपमें अवतीर्ण होंगे ।। ५४ ।। त्रिशिरास्तस्य दिव्यश्च शातकुम्भमयो द्रुमः । ध्वजस्तृणेन्द्रो देवस्य भविष्यति रथाश्रितः ।। ५५ ।। बलदेवजीके रथपर तीन शिखाओंसे युक्त दिव्य सुवर्णमय तालवृक्ष ध्वजके रूपमें सुशोभित होगा ।। ५५ ।। शिरो नागैर्महाभोगैः परिकीर्णं महात्मभिः । भविष्यति महाबाहोः सर्वलोकेश्वरस्य च ।। ५६ ।। सर्वलोकेश्वर महाबाहु बलरामजीका मस्तक बड़े-बड़े फनवाले विशालकाय सर्पोंसे घिरा हुआ होगा ।। ५६ ।। चिन्तितानि समेष्यन्ति शस्त्राण्यस्त्राणि चैव ह । अनन्तश्च स एवोक्तो भगवान् हरिरव्ययः ।। ५७ ।। उनके चिन्तन करते ही सम्पूर्ण दिव्य अस्त्र-शस्त्र उन्हें प्राप्त हो जायँगे। अविनाशी भगवान् श्रीहरि ही अनन्त शेषनाग कहे गये हैं ।। ५७ ।। समादिष्टश्च विबुधैर्दर्शय त्वमिति प्रभो । सुपर्णो यस्य वीर्येण कश्यपस्यात्मजो बली । अन्तं नैवाशकद् द्रष्टुं देवस्य परमात्मनः ।। ५८ ।। पूर्वकालमें देवताओंने गरुड़जीसे यह अनुरोध किया कि 'आप हमें भगवान् शेषका अन्त दिखा दीजिये।' तब कश्यपके बलवान् पुत्र गरुड़ अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उन परमात्मदेव अनन्तका अन्त न देख सके ।। ५८ ।। स च शेषो विचरते परया वै मुदा युतः । अन्तर्वसति भोगेन परिरभ्य वसुन्धराम् ।। ५९ ।। वे भगवान् शेष बड़े आनन्दके साथ सर्वत्र विचरते हैं और अपने विशाल शरीरसे पृथिवीको आलिंगनपाशमें बाँधकर पाताललोकमें निवास करते हैं ।। ५९ ।। य एव विष्णुः सोऽनन्तो भगवान् वसुधाधरः । यो रामः स हृषीकेशो योऽच्युतः स धराधरः ।। ६० ।। जो भगवान् विष्णु हैं, वे ही इस पृथिवीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त हैं। जो बलराम हैं वे ही श्रीकृष्ण हैं, जो श्रीकृष्ण हैं वे ही भूमिधर बलराम हैं ।। ६० ।।