महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1406, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्हितश्चार्हयेन्नित्यं पूजितः प्रतिपूजयेत् ॥ ४६ ॥ वे भगवान् नारायण हरि देवलोकमें सबसे श्रेष्ठ हैं। जो उनकी वन्दना करता है, उसकी वे भी वन्दना करते हैं। जो उनका आदर करता है, उसका वे भी आदर करते हैं। इसी प्रकार अर्चित होनेपर वे भी अर्चना करते और पूजित या प्रशंसित होनेपर वे भी पूजा या प्रशंसा करते हैं ॥ ४६ ॥
दृष्टः पश्येदहरहः संश्रितः प्रतिसंश्रयेत् । अर्चितश्चार्चयेन्नित्यं स देवो द्विजसत्तमाः ॥ ४७ ॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो प्रतिदिन उनका दर्शन करता है, उसकी ओर वे भी कृपादृष्टि करते हैं। जो उनका आश्रय लेता है, उसके हृदयमें वे भी आश्रय लेते हैं तथा जो उनकी पूजा करता है, उसकी वे भी सदा पूजा करते हैं ॥ ४७ ॥
एतत् तस्यानवद्यस्य विष्णोर्वै परमं व्रतम् । आदिदेवस्य महतः सज्जनाचरितं सदा ॥ ४८ ॥ उन प्रशंसनीय आदि देवता भगवान् महाविष्णुका यह उत्तम व्रत है, जिसका साधु पुरुष सदा आचरण करते आये हैं ॥ ४८ ॥
भुवनेऽभ्यर्चितो नित्यं देवैरपि सनातनः । अभयेनानुरूपेण युज्यन्ते तमनुव्रताः ॥ ४९ ॥ वे सनातन देवता हैं, अतः इस त्रिभुवनमें देवता भी सदा उन्हींकी पूजा करते हैं। जो उनके अनन्य भक्त हैं, वे अपने भजनके अनुरूप ही निर्भय पद प्राप्त करते हैं ॥ ४९ ॥
कर्मणा मनसा वाचा स नमस्यो द्विजैः सदा । यत्नवद्भिरुपस्थाय द्रष्टव्यो देवकीसुतः ॥ ५० ॥ द्विजोंको चाहिये कि वे मन, वाणी और कर्मसे सदा उन भगवान्को प्रणाम करें और यत्नपूर्वक उपासना करके उन देवकीनन्दनका दर्शन करें ॥ ५० ॥
एष वोऽभिहितो मार्गो मया वै मुनिसत्तमाः । तं दृष्ट्वा सर्वशो देवं दृष्टाः स्युः सुरसत्तमाः ॥ ५१ ॥ मुनिवरो! यह मैंने आपलोगोंको उत्तम मार्ग बता दिया है। उन भगवान् वासुदेवका सब प्रकारसे दर्शन कर लेनेपर सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवताओंका दर्शन करना हो जायगा ॥ ५१ ॥
महावराहं तं देवं सर्वलोकपितामहम् । अहं चैव नमस्यामि नित्यमेव जगत्पतिम् ॥ ५२ ॥ मैं भी महावराहरूप धारण करनेवाले उन सर्वलोक-पितामह जगदीश्वरको नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ ५२ ॥
तत्र च त्रितयं दृष्टं भविष्यति न संशयः । समस्ता हि वयं देवास्तस्य देहे वसामहे ॥ ५३ ॥