महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1405, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो मेरा और पितामह ब्रह्माजीका दर्शन करना चाहता हो, उसे प्रतापी भगवान् वासुदेवका दर्शन करना चाहिये ॥ ३८ ॥ दृष्टे तस्मिन्नहं दृष्टो न मेऽत्रास्ति विचारणा । पितामहो वा देवेश इति वित्त तपोधनाः ॥ ३९ ॥ तपोधनो! उनका दर्शन हो जानेपर मेरा ही दर्शन हो गया, अथवा उनके दर्शनसे देवेश्वर ब्रह्माजीका दर्शन हो गया ऐसे समझो, इस विषयमें मुझे कोई विचार नहीं करना है अर्थात् संदेह नहीं है ॥ ३९ ॥ स यस्य पुण्डरीकाक्षः प्रीतियुक्तो भविष्यति । तस्य देवगणः प्रीतो ब्रह्मपूर्वो भविष्यति ॥ ४० ॥ जिसपर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न होंगे, उसके ऊपर ब्रह्मा आदि देवताओंका समुदाय प्रसन्न हो जायगा ॥ ४० ॥ यश्च तं मानवे लोके संश्रयिष्यति केशवम् । तस्य कीर्तिर्जयश्चैव स्वर्गश्चैव भविष्यति ॥ ४१ ॥ मानवलोकमें जो भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेगा, उसे कीर्ति, विजय तथा उत्तम स्वर्गकी प्राप्ति होगी ॥ ४१ ॥ धर्माणां देशिकः साक्षात् स भविष्यति धर्मभाक् । धर्मवद्भिः स देवेशो नमस्कार्यः सदोद्यतैः ॥ ४२ ॥ इतना ही नहीं, वह धर्मोंका उपदेश देनेवाला साक्षात् धर्माचार्य एवं धर्मफलका भागी होगा। अतः धर्मात्मा पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा उत्साहित रहकर देवेश्वर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करें ॥ ४२ ॥ धर्म एव परो हि स्यात् तस्मिन्नभ्यर्चिते विभौ । स हि देवो महातेजाः प्रजाहितचिकीर्षया ॥ ४३ ॥ धर्मार्थं पुरुषव्याघ्र ऋषिकोटीः ससर्ज ह । ताः सृष्टास्तेन विभुना पर्वते गन्धमादने ॥ ४४ ॥ सनत्कुमारप्रमुखास्तिष्ठन्ति तपसान्विताः । तस्मात् स वाग्मी धर्मज्ञो नमस्यो द्विजपुङ्गवाः ॥ ४५ ॥ उन सर्वव्यापी परमेश्वरकी पूजा करनेसे परम धर्मकी सिद्धि होगी। वे महान् तेजस्वी देवता हैं। उन पुरुषसिंह श्रीकृष्णने प्रजाका हित करनेकी इच्छासे धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये करोड़ों ऋषियोंकी सृष्टि की है। भगवान्के उत्पन्न किये हुए वे सनत्कुमार आदि ऋषि गन्धमादन पर्वतपर सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं। अतः द्विजवरो! उन प्रवचन-कुशल, धर्मज्ञ वासुदेवको सदा प्रणाम करना चाहिये ॥ ४३—४५ ॥ दिवि श्रेष्ठो हि भगवान् हरिनारायणः प्रभुः । वन्दितो हि स वन्देत मानितो मानयीत च ।