महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1409, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन और भीष्मजीका युधिष्ठिरको राज्य करनेके लिये आदेश देना
नारद उवाच
अथ व्योम्नि महान् शब्दः सविद्युत्स्तनयित्नुमान् ।
मेघैश्च गगनं नीलं संरुद्धमभवद् घनैः ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**तदनन्तर आकाशमें बिजलीकी गड़गड़ाहट और मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके साथ महान् शब्द होने लगा। मेघोंकी घनघोर घटासे घिरकर सारा आकाश नीला हो गया ॥ १ ॥
प्रावृषीव च पर्जन्यो ववृषे निर्मलं पयः ।
तमश्चैवाभवद् घोरं दिशश्च न चकाशिरे ॥ २ ॥
वर्षाकालकी भाँति मेघसमूह निर्मल जलकी वर्षा करने लगा। सब ओर घोर अन्धकार छा गया। दिशाएँ नहीं सूझती थीं ॥ २ ॥
ततो देवगिरौ तस्मिन् रम्ये पुण्ये सनातने ।
न शर्वं भूतसंघं वा ददृशुर्मुनयस्तदा ॥ ३ ॥
उस समय उस रमणीय, पवित्र एवं सनातन देवगिरिपर ऋषियोंने जब दृष्टिपात किया, तब उन्हें वहाँ न तो भगवान् शंकर दिखायी दिये और न भूतोंके समुदायका ही दर्शन हुआ ॥ ३ ॥
व्यभ्रं च गगनं सद्यः क्षणेन समपद्यत ।
तीर्थयात्रां ततो विप्रा जग्मुश्चान्ये यथागतम् ॥ ४ ॥
फिर तो तत्काल एक ही क्षणमें सारा आसमान साफ हो गया। कहीं भी बादल नहीं रह गया। तब ब्राह्मणलोग वहाँसे तीर्थयात्राके लिये चल दिये और अन्य लोग भी जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये ॥ ४ ॥
तदद्भुतमचिन्त्यं च दृष्ट्वा ते विस्मिताऽभवन् ।
शङ्करस्योमया सार्धं संवादं त्वत्कथाश्रयम् ॥ ५ ॥
स भवान् पुरुषव्याघ्र ब्रह्मभूतः सनातनः ।
यदर्थमनुशिष्टाः स्मो गिरिपृष्ठे महात्मना ॥ ६ ॥
यह अद्भुत और अचिन्त्य घटना देखकर सब लोग आश्चर्यचकित हो उठे। पुरुषसिंह देवकीनन्दन! भगवान् शंकरका पार्वतीजीके साथ जो आपके सम्बन्धमें संवाद हुआ, उसे