भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1523, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1523

लिङ्गं पूजयिता नित्यं महतीं श्रियमश्नुते ॥ १६ ॥ जो महात्मा शंकरके श्रीविग्रह अथवा लिंगकी पूजा करता है, वह लिंगपूजक सदा बहुत बड़ी सम्पत्तिका भागी होता है ॥ १६ ॥

ऋषयश्चापि देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तथा । लिङ्गमेवार्चयन्ति स्म यत् तदूर्ध्वं समास्थितम् ॥ १७ ॥ पूज्यमाने ततस्तस्मिन् मोदते स महेश्वरः । सुखं ददाति प्रीतात्मा भक्तानां भक्तवत्सलः ॥ १८ ॥ ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ ऊर्ध्वलोकमें स्थित शिवलिंगकी ही पूजा करती हैं। इस प्रकार शिवलिंगकी पूजा होनेपर भक्तवत्सल भगवान् महेश्वर बड़े प्रसन्न होते हैं और प्रसन्नचित्त होकर वे भक्तोंको सुख देते हैं ॥ १७-१८ ॥

एष एव श्मशानेषु देवो वसति निर्दहन् । यजन्ते ते जनास्तत्र वीरस्थाननिषेविणः ॥ १९ ॥ ये ही भगवान् शंकर अग्निरूपसे शवको दग्ध करते हुए श्मशानभूमिमें निवास करते हैं। जो लोग वहाँ उनकी पूजा करते हैं, उन्हें वीरोंको प्राप्त होनेवाले उत्तम लोक प्राप्त होते हैं ॥ १९ ॥

विषयस्थः शरीरेषु स मृत्युः प्राणिनामिह । स च वायुः शरीरेषु प्राणापानशरीरिणाम् ॥ २० ॥ वे प्राणियोंके शरीरोंमें रहनेवाले और उनके मृत्युरूप हैं तथा वे ही प्राण-अपान आदि वायुके रूपसे देहके भीतर निवास करते हैं ॥ २० ॥

तस्य घोराणि रूपाणि दीप्तानि च बहूनि च । लोके यान्यस्य पूज्यन्ते विप्रास्तानि विदुर्बुधाः ॥ २१ ॥ उनके बहुत-से भयंकर एवं उद्दीप्त रूप हैं, जिनकी जगत्में पूजा होती है। विद्वान् ब्राह्मण ही उन सब रूपोंको जानते हैं ॥ २१ ॥

नामधेयानि देवेषु बहून्यस्य यथार्थवत् । निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात् कर्मभिस्तथा ॥ २२ ॥ उनकी महत्ता, व्यापकता तथा दिव्य कर्मोंके अनुसार देवताओंमें उनके बहुत-से यथार्थ नाम प्रचलित हैं ॥ २२ ॥

वेदे चास्य विदुर्विप्राः शतरुद्रीयमुत्तमम् । व्यासेनोक्तं च यच्चापि उपस्थानं महात्मनः ॥ २३ ॥ वेदके शतरुद्रिय प्रकरणमें उनके सैकड़ों उत्तम नाम हैं, जिन्हें वेदवेत्ता ब्राह्मण जानते हैं। महर्षि व्यासने भी उन महात्मा शिवका उपस्थान (स्तवन) बताया है ॥ २३ ॥

प्रदाता सर्वलोकानां विश्वं चाप्युच्यते महत् । ज्येष्ठभूतं वदन्त्येनं ब्राह्मणा ऋषयोऽपरे ॥ २४ ॥