महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1527, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंततस्तैर्भिद्यते वृत्तं शृणु चैव युधिष्ठिर ॥ १२ ॥
फिर तो घास-फूससे ढके हुए कुएँकी भाँति अधर्म ही धर्मका चोला पहनकर सामने आता है। युधिष्ठिर! उस अवस्थामें वे दुराचारी मनुष्य शिष्टाचारकी मर्यादा तोड़ डालते हैं। तुम इस विषयको ध्यान देकर सुनो ॥ १२ ॥
अवृत्ता ये तु भिन्दन्ति श्रुतित्यागपरायणाः ।
धर्मविद्वेषिणो मन्दा इत्युक्तस्तेषु संशयः ॥ १३ ॥
जो आचारहीन हैं, वेद-शास्त्रोंका त्याग करनेवाले हैं, वे धर्मद्रोही मन्दबुद्धि मानव सज्जनोंद्वारा स्थापित धर्म और आचारकी मर्यादा भंग कर देते हैं। इस प्रकार प्रत्यक्ष, अनुमान और शिष्टाचार—इन तीनोंमें संदेह बताया गया है (अतः वे अविश्वसनीय हैं) ॥ १३ ॥
अतृप्यन्तस्तु साधूनां य एवागमबुद्धयः ।
परमित्येव संतुष्टास्तानुपास्व च पृच्छ च ॥ १४ ॥
कामार्थौ पृष्ठतः कृत्वा लोभमोहानुसारिणौ ।
धर्म इत्येव सम्बुद्धास्तानुपास्व च पृच्छ च ॥ १५ ॥
ऐसी स्थितिमें जो साधुसंगके लिये नित्य उत्कण्ठित रहते हों—उससे कभी तृप्त न होते हों, जिनकी बुद्धि आगम प्रमाणको ही श्रेष्ठ मानती हो, जो सदा संतुष्ट रहते तथा लोभ-मोहका अनुसरण करनेवाले अर्थ और कामकी उपेक्षा करके धर्मको ही उत्तम समझते हों, ऐसे महापुरुषोंकी सेवामें रहो और उनसे अपना संदेह पूछो ॥ १४-१५ ॥
न तेषां भिद्यते वृत्तं यज्ञाः स्वाध्यायकर्म च ।
आचारः कारणं चैव धर्मश्चैकस्त्रयं पुनः ॥ १६ ॥
उन संतोंके सदाचार, यज्ञ और स्वाध्याय आदि शुभ-कर्मोंके अनुष्ठानमें कभी बाधा नहीं पड़ती। उनमें आचार, उसको बतानेवाले वेद-शास्त्र तथा धर्म—इन तीनोंकी एकता होती है ॥ १६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
पुनरेव हि मे बुद्धिः संशये परिमुह्यति ।
अपारे मार्गमाणस्य परं तीरमपश्यतः ॥ १७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! मेरी बुद्धि संशयके अपार समुद्रमें डूब रही है। मैं इसके पार जाना चाहता हूँ, किंतु ढूँढ़नेपर भी मुझे इसका कोई किनारा नहीं दिखायी देता ॥ १७ ॥
वेदः प्रत्यक्षमाचारः प्रमाणं तत्त्रयं यदि ।
पृथक्त्वं लभ्यते चैषां धर्मश्चैकस्त्रयं कथम् ॥ १८ ॥