भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1581, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1581

यदा तु परमामार्तिं गतोऽसौ सपुरो नृपः । ततः प्रदध्मौ स करं प्रादुरासीत् ततो बलम् ॥ १५ ॥ जब वे नरेश नगरवासियोंसहित भारी विपत्तिमें पड़ गये, तब उन्होंने अपने हाथको मुँहसे लगाकर उसे शंखकी भाँति बजाया। इससे बहुत बड़ी सेना प्रकट हो गयी ॥ १५ ॥

ततस्तानजयत् सर्वान् प्रातिसीमान् नराधिपान् । एतस्मात् कारणाद् राजन् विश्रुतः स करन्धमः ॥ १६ ॥ राजन्! उसीकी सहायतासे उन्होंने अपने राज्यकी सीमापर निवास करनेवाले सम्पूर्ण शत्रु नरेशोंको परास्त कर दिया। इसी कारणसे अर्थात् करका धमन करने (हाथको बजाने)-से उनका नाम करन्धम हो गया ॥ १६ ॥

तस्य कारन्धमः पुत्रस्त्रेतायुगमुखेऽभवत् । इन्द्रादनवरः श्रीमान् देवैरपि सुदुर्जयः ॥ १७ ॥ करन्धमके त्रेतायुगके आरम्भमें एक कान्तिमान् पुत्र हुआ, जो कारन्धम कहलाया। वह इन्द्रसे किसी भी बातमें कम नहीं था। उसे परास्त करना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था ॥ १७ ॥

तस्य सर्वे महीपाला वर्तन्ते स्म वशे तदा । स हि सम्राडभूत् तेषां वृत्तेन च बलेन च ॥ १८ ॥ उस समयके सभी भूपाल कारन्धमके अधीन हो गये थे। वह अपने सदाचार और बलके द्वारा उन सबका सम्राट् हो गया था ॥ १८ ॥

अविक्षिन्नाम धर्मात्मा शौर्येणेन्द्रसमोऽभवत् । यज्ञशीलो धर्मरतिर्धृतिमान् संयतेन्द्रियः ॥ १९ ॥ उस धर्मात्मा करन्धमकुमारका नाम अविक्षित् था। वह अपने शौर्यके द्वारा इन्द्रकी समानता करता था। वह यज्ञशील, धर्मानुरागी, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय था ॥ १९ ॥

तेजसाऽऽदित्यसदृशः क्षमया पृथिवीसमः । बृहस्पतिसमो बुद्ध्या हिमवानिव सुस्थिरः ॥ २० ॥ तेजमें सूर्य, क्षमामें पृथ्वी, बुद्धिमें बृहस्पति और सुस्थिरतामें हिमवान् पर्वतके समान माना जाता था ॥ २० ॥

कर्मणा मनसा वाचा दमेन प्रशमेन च । मनांस्याराधयामास प्रजानां स महीपतिः ॥ २१ ॥ राजा अविक्षित् मन, वाणी, क्रिया, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रहके द्वारा प्रजाजनोंका चित्त संतुष्ट किये रहते थे ॥ २१ ॥

य ईजे हयमेधानां शतेन विधिवत् प्रभुः । याजयामास यं विद्वान् स्वयमेवाङ्गिराः प्रभुः ॥ २२ ॥