भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1580, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1580

ज्येष्ठ था, उसका नाम खनीनेत्र था। वह अपने उन सभी छोटे भाइयोंको बहुत कष्ट देता था ॥ ६-७ ॥ खनीनेत्रस्तु विक्रान्तो जित्वा राज्यमकण्टकम् । नाशकद् रक्षितुं राज्यं नान्वरज्यन्त तं प्रजाः ॥ ८ ॥ खनीनेत्र पराक्रमी होनेके कारण निष्कण्टक राज्यको जीतकर भी उसकी रक्षा न कर सका; क्योंकि प्रजाका उसमें अनुराग न था ॥ ८ ॥ तमपास्य च तद्राज्ये तस्य पुत्रं सुवर्चसम् । अभ्यषिञ्चन्त राजेन्द्र मुदिता ह्यभवंस्तदा ॥ ९ ॥ राजेन्द्र! उसे राज्यसे हटाकर प्रजाने उसीके पुत्र सुवर्चाको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया। उस समय प्रजावर्गको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ९ ॥ स पितुर्विक्रियां दृष्ट्वा राज्यान्निर्सनं च तत् । नियतो वर्तयामास प्रजाहितचिकीर्षया ॥ १० ॥ सुवर्चा अपने पिताकी वह दुर्दशा, वह राज्यसे निष्कासन देखकर सावधान हो नियमपूर्वक प्रजाके हितकी इच्छासे सबके साथ उत्तम बर्ताव करने लगे ॥ १० ॥ ब्रह्मण्यः सत्यवादी च शुचिः शमदमान्वितः । प्रजास्तं चान्वरज्यन्त धर्मनित्यं मनस्विनम् ॥ ११ ॥ वे ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति रखते, सत्य बोलते, बाहर-भीतरसे पवित्र रहते और मन तथा इन्द्रियोंको अपने वशमें रखते थे। सदा धर्ममें लगे रहनेवाले उन मनस्वी नरेशपर प्रजाजनोंका विशेष अनुराग था ॥ ११ ॥ तस्य धर्मप्रवृत्तस्य व्यशीर्यत् कोशवाहनम् । तं क्षीणकोशं सामन्ताः समन्तात् पर्यपीडयन् ॥ १२ ॥ किंतु केवल धर्ममें ही प्रवृत्त रहनेके कारण कुछ ही दिनोंमें राजाका खजाना खाली हो गया और उनके वाहन आदि भी नष्ट हो गये। उनका खजाना खाली हो गया, यह जानकर सामन्त नरेश चारों ओरसे धावा करके उन्हें पीड़ा देने लगे ॥ १२ ॥ स पीड्यमानो बहुभिः क्षीणकोशाश्ववाहनः । आर्तिमार्च्छत् परां राजा सह भृत्यैः पुरेण च ॥ १३ ॥ उनका कोष और घोड़े आदि वाहन तो नष्ट हो ही गये थे। बहुसंख्यक शत्रुओंने एक साथ धावा करके उन्हें सताना आरम्भ कर दिया। इससे राजा सुवर्चा अपने सेवकों और पुरवासियोंसहित भारी संकटमें पड़ गये ॥ १३ ॥ न चैनमभिहन्तुं ते शक्नुवन्ति बलक्षये । सम्यग्वृत्तो हि राजा स धर्मनित्यो युधिष्ठिर ॥ १४ ॥ युधिष्ठिर! सेना और खजाना नष्ट हो जानेपर भी वे आक्रमणकारी शत्रु सुवर्चाका वध न कर सके; क्योंकि वे राजा नित्यधर्मपरायण और सदाचारी थे ॥ १४ ॥