भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1579, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1579

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चतुर्थोऽध्यायः

मरुत्तके पूर्वजोंका परिचय देते हुए व्यासजीके द्वारा उनके गुण, प्रभाव एवं यज्ञका दिग्दर्शन

युधिष्ठिर उवाच

शुश्रूषे तस्य धर्मज्ञ राजर्षेः परिकीर्तनम् ।
द्वैपायन मरुत्तस्य कथां प्रब्रूहि मेऽनघ ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— धर्मके ज्ञाता, निष्पाप महर्षि द्वैपायन! मैं राजर्षि मरुत्तकी कथा और उनके गुणोंका कीर्तन सुनना चाहता हूँ। कृपया मुझसे कहिये ॥ १ ॥

व्यास उवाच

आसीत् कृतयुगे तात मनुर्दण्डधरः प्रभुः ।
तस्य पुत्रो महाबाहुः प्रसन्धिरिति विश्रुतः ॥ २ ॥
व्यासजीने कहा— तात! सत्ययुगमें राजदण्ड धारण करनेवाले शक्तिशाली वैवस्वत मनु एक प्रसिद्ध राजा थे। उनके पुत्र महाबाहु प्रसन्धिके नामसे विख्यात थे ॥ २ ॥
प्रसन्धेरभवत् पुत्रः क्षुप इत्यभिविश्रुतः ।
क्षुपस्य पुत्र इक्ष्वाकुर्महीपालोऽभवत् प्रभुः ॥ ३ ॥
प्रसन्धिके पुत्र क्षुप और क्षुपके पुत्र शक्तिशाली महाराज इक्ष्वाकु हुए ॥ ३ ॥
तस्य पुत्रशतं राजन्नासीत् परमधार्मिकम् ।
तांस्तु सर्वान् महीपालानिक्ष्वाकुरकरोत् प्रभुः ॥ ४ ॥
राजन्! इक्ष्वाकुके सौ पुत्र हुए, जो बड़े धार्मिक थे। प्रभावशाली इक्ष्वाकुने उन सभी पुत्रोंको इस पृथ्वीका पालक बना दिया ॥ ४ ॥
तेषां ज्येष्ठस्तु विंशोऽभूत् प्रतिमानं धनुष्मताम् ।
विंशस्य पुत्रः कल्याणो विविंशो नाम भारत ॥ ५ ॥
उनमें सबसे ज्येष्ठ पुत्रका नाम था विंश, जो धनुर्धर वीरोंका आदर्श था। भारत! विंशके कल्याणमय पुत्रका नाम विविंश हुआ ॥ ५ ॥
विविंशस्य सुता राजन् बभूवुर्दश पञ्च च ।
सर्वे धनुषि विक्रान्ता ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ॥ ६ ॥
दानधर्मरताः शान्ताः सततं प्रियवादिनः ।
तेषां ज्येष्ठः खनीनेत्रः स तान् सर्वानपीडयत् ॥ ७ ॥
राजन्! विविंशके पन्द्रह पुत्र हुए। वे सब-के-सब धनुर्विद्यामें पराक्रमी, ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, दान-धर्मपरायण, शान्त और सर्वदा मधुर भाषण करनेवाले थे। इन सबमें जो

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