महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमरुत्त उवाच
संजीवितोऽहं भवता वाक्येनानेन नारद ।
पश्येयं क्व नु संवर्तं शंस मे वदतां वर ॥ २० ॥
कथं च तस्मै वर्तेयं कथं मां न परित्यजेत् ।
प्रत्याख्यातश्च तेनापि नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ २१ ॥
**मरुत्त बोले—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजी! आपने यह बात बताकर मुझे जिला दिया। अब यह बताइये कि मैं संवर्त मुनिका दर्शन कहाँ कर सकूँगा? मुझे उनके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये? मैं कैसा व्यवहार करूँ, जिससे वे मेरा परित्याग न करें। यदि उन्होंने भी मेरी प्रार्थना ठुकरा दी तब मैं जीवित नहीं रह सकूँगा ॥ २०-२१ ॥
नारद उवाच
उन्मत्तवेषं बिभ्रत् स चङ्क्रमीति यथासुखम् ।
वाराणस्यां महाराज दर्शनेप्सुर्महेश्वरम् ॥ २२ ॥
**नारदजीने कहा—**महाराज! वे इस समय वाराणसीमें महेश्वर विश्वनाथके दर्शनकी इच्छासे पागलका-सा वेष धारण किये अपनी मौजसे घूम रहे हैं ॥ २२ ॥
तस्या द्वारं समासाद्य न्यसेथाः कुणपं क्वचित् ।
तं दृष्ट्वा यो निवर्तेत संवर्तः स महीपते ॥ २३ ॥