महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1598, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजब मैं तुम्हारा यज्ञ कराऊँगा, तब बृहस्पति और इन्द्र दोनों ही कुपित होकर मेरे साथ द्वेष करेंगे। उस समय तुम्हें मेरे पक्षका समर्थन करना होगा ॥ २० ॥
स्थैर्यमत्र कथं मे स्यात् सत्त्वं निःसंशयं कुरु । कुपितस्त्वां न हीदानीं भस्म कुर्यां सबान्धवम् ॥ २१ ॥
परंतु इस बातका मुझे विश्वास कैसे हो कि तुम मेरा साथ दोगे। अतः जैसे भी हो, मेरे मनका संशय दूर हो; नहीं तो अभी क्रोधमें भरकर मैं बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हें भस्म कर डालूँगा ॥ २१ ॥
मरुत्त उवाच
यावत् तपेत् सहस्रांशुस्तिष्ठेरंश्चापि पर्वताः । तावल्लोकान्न लभेयं त्यजेयं सङ्गतं यदि ॥ २२ ॥
**मरुत्तने कहा—**ब्रह्मन्! यदि मैं आपका साथ छोड़ दूँ तो जबतक सूर्य तपते हों और जबतक पर्वत स्थिर रहें तबतक मुझे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति न हो ॥ २२ ॥
मा चापि शुभबुद्धित्वं लभेयमिह कर्हिचित् । विषयैः सङ्गतं चास्तु त्यजेयं सङ्गतं यदि ॥ २३ ॥
यदि आपका साथ छोड़ दूँ तो मुझे संसारमें शुभ बुद्धि कभी न प्राप्त हो और मैं सदा विषयोंमें ही रचा-पचा रह जाऊँ ॥ २३ ॥
संवर्त उवाच
आविक्षित शुभा बुद्धिवर्ततां तव कर्मसु । याजनं हि ममाप्येव वर्तते हृदि पार्थिव ॥ २४ ॥
**संवर्तने कहा—**अविक्षित्-कुमार! तुम्हारी शुभ बुद्धि सदा सत्कर्मोंमें ही लगी रहे। पृथ्वीनाथ! मेरे मनमें भी तुम्हारा यज्ञ करानेकी इच्छा तो है ही ॥ २४ ॥
अभिधास्ये च ते राजन्नक्षयं द्रव्यमुत्तमम् । येन देवान् सगन्धर्वान् शक्रं चाभिभविष्यसि ॥ २५ ॥
राजन्! इसके लिये मैं तुम्हें परम उत्तम अक्षय धनकी प्राप्तिका उपाय बतलाऊँगा, जिससे तुम गन्धर्वों-सहित सम्पूर्ण देवताओं तथा इन्द्रको भी नीचा दिखा सकोगे ॥ २५ ॥
न तु मे वर्तते बुद्धिर्धने याज्येषु वा पुनः । विप्रियं तु करिष्यामि भ्रातुश्चेन्द्रस्य चोभयोः ॥ २६ ॥
मुझको अपने लिये धन अथवा यजमानोंके संग्रहका विचार नहीं है। मुझे तो भाई बृहस्पति और इन्द्र दोनोंके विरुद्ध कार्य करना है ॥ २६ ॥
गमयिष्यामि शक्रेण समतामपि ते ध्रुवम् । प्रियं च ते करिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २७ ॥