महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1597, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंन मां कामयते याज्यमसौ वासवकाम्यया ॥ १३ ॥
मरुत्तने कहा—संवर्तजी! मैं पहले बृहस्पतिजीके ही पास गया था। वहाँका समाचार बताता हूँ, सुनिये। वे इन्द्रको प्रसन्न रखनेकी इच्छासे अब मुझे अपना यजमान बनाना नहीं चाहते हैं ॥ १३ ॥
अमरं याज्यमासाद्य याजयिष्ये न मानुषम् ।
शक्रेण प्रतिषिद्धोऽहं मरुत्तं मा स्म याजयेः ॥ १४ ॥
स्पर्धते हि मया विप्र सदा हि स तु पार्थिवः ।
एवमस्त्विति चाप्युक्तो भ्रात्रा ते बलसूदनः ॥ १५ ॥
उन्होंने स्पष्ट कह दिया है कि 'अमर यजमान पाकर अब मैं मरणधर्मा मनुष्यका यज्ञ नहीं कराऊँगा।' साथ ही इन्द्रने मना भी किया है कि 'आप मरुत्तका यज्ञ न कराइयेगा; क्योंकि ब्रह्मन्! वह राजा सदा मेरे साथ ईर्ष्या रखता है।' इन्द्रकी इस बातको आपके भाईने 'एवमस्तु' कहकर स्वीकार कर लिया है ॥ १४-१५ ॥
स मामधिगतं प्रेम्णा याज्यत्वेन बुभूषति ।
देवराजं समाश्रित्य तद् विद्धि मुनिपुङ्गव ॥ १६ ॥
मुनिप्रवर! मैं बड़े प्रेमसे उनके पास गया था; परंतु वे देवराज इन्द्रका आश्रय लेकर मुझे अपना यजमान बनाना ही नहीं चाहते हैं। इस बातको आप अच्छी तरह जान लें ॥ १६ ॥
सोऽहमिच्छामि भवता सर्वस्वेनापि याजितुम् ।
कामये समतिक्रान्तुं वासवं त्वत्कृतैर्गुणैः ॥ १७ ॥
अतः मेरी इच्छा यह है कि मैं सर्वस्व देकर भी आपसे ही यज्ञ कराऊँ और आपके द्वारा सम्पादित गुणोंके प्रभावसे इन्द्रको भी मात कर दूँ ॥ १७ ॥
न हि मे वर्तते बुद्धिर्गन्तुं ब्रह्मन् बृहस्पतिम् ।
प्रत्याख्यातो हि तेनास्मि तथानपकृते सति ॥ १८ ॥
ब्रह्मन्! अब बृहस्पतिके पास जानेका मेरा विचार नहीं है; क्योंकि बिना अपराधके ही उन्होंने मेरी प्रार्थना अस्वीकृत कर दी है ॥ १८ ॥
संवर्त उवाच
चिकीर्षसि यथाकामं सर्वमेतत् त्वयि ध्रुवम् ।
यदि सर्वानभिप्रायन् कर्तासि मम पार्थिव ॥ १९ ॥
संवर्तने कहा—पृथ्वीनाथ! यदि मेरी इच्छाके अनुसार काम करो तो तुम जो कुछ चाहोगे, वह निश्चय ही पूर्ण होगा ॥ १९ ॥
याज्यमानं मया हि त्वां बृहस्पतिपुरन्दरौ ।
द्विषेतां समभिक्रुद्धावेतदेकं समर्थसेः ॥ २० ॥