महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1596, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रुत्वा तु पार्थिवस्यैतत् संवर्तः प्रमुदं गतः । एतावदहमप्येवं शक्नुयामिति सोऽब्रवीत् ॥ ६ ॥ व्यासजी कहते हैं— राजन्! राजाकी यह बात सुनकर संवर्तको बड़ी प्रसन्नता हुई और बोले— 'इतना तो मैं भी कर सकता हूँ' ॥ ६ ॥ ततो मरुत्तमुन्मत्तो वाचा निर्भर्त्सयन्निव । रूक्षया ब्राह्मणो राजन् पुनः पुनरथाब्रवीत् ॥ ७ ॥ राजन्! वे उन्मत्त वेषधारी ब्राह्मण देवता मरुत्तको अपनी रूखी वाणीद्वारा बारंबार फटकारते हुए-से बोले— ॥ ७ ॥ वातप्रधानेन मया स्वचित्तवशवर्तिना । एवं विकृतरूपेण कथं याजितुमिच्छसि ॥ ८ ॥ ‘नरेश्वर! मैं तो वायु-प्रधान—बावला हूँ, अपने मनकी मौजसे ही सब काम करता हूँ, मेरा रूप भी विकृत है। अतः मुझ-जैसे व्यक्तिसे तुम क्यों यज्ञ कराना चाहते हो? ॥ ८ ॥ भ्राता मम समर्थश्च वासवेन च संगतः । वर्तते याजने चैव तेन कर्माणि कारय ॥ ९ ॥ ‘मेरे भाई बृहस्पति इस कार्यमें पूर्णतः समर्थ हैं। आजकल इन्द्रके साथ उनका मेलजोल बढ़ा हुआ है। वे उनके यज्ञ करानेमें लगे रहते हैं। अतः उन्हींसे अपने सारे यज्ञकर्म कराओ ॥ ९ ॥ गार्हस्थ्यं चैव याज्याश्च सर्वा गृह्याश्च देवताः । पूर्वजेन ममाक्षिप्तं शरीरं वर्जितं त्विदम् ॥ १० ॥ ‘घर-गृहस्थीका सारा सामान, यजमान तथा गृहदेवताओंके पूजन आदि कर्म—इन सबको इस समय मेरे बड़े भाईने अपने अधिकारमें कर लिया है। मेरे पास तो केवल मेरा एक शरीर ही छोड़ रखा है ॥ १० ॥ नाहं तेनाननुज्ञातस्त्वामाविक्षित कर्हिचित् । याजयेयं कथंचिद् वै स हि पूज्यतमो मम ॥ ११ ॥ ‘आविक्षित्-कुमार! मैं उनकी आज्ञा प्राप्त किये बिना कभी किसी तरह भी तुम्हारा यज्ञ नहीं करा सकता; क्योंकि वे मेरे परम पूजनीय भाई हैं ॥ ११ ॥ स त्वं बृहस्पतिं गच्छ तमनुज्ञाप्य चाव्रज । ततोऽहं याजयिष्ये त्वां यदि यष्टुमिहेच्छसि ॥ १२ ॥ ‘अतः तुम बृहस्पतिके पास जाओ और उनकी आज्ञा लेकर आओ। उस दशामें यदि तुम यज्ञ कराना चाहो तो मैं यज्ञ करा दूँगा' ॥ १२ ॥
मरुत्त उवाच
बृहस्पतिं गतः पूर्वमहं संवर्त तच्छृणु ।