महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1604, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंशर्व, गौरीश, ईश्वर, शितिकण्ठ, अजन्मा, शुक्र, पृथु, पृथुहर, वर, विश्वरूप, विरूपाक्ष, बहुरूप, उमापति, कामदेवको भस्म करनेवाले, हर, चतुर्मुख एवं शरणागतवत्सल महादेवजीको सिरसे प्रणाम करके उनके शरणापन्न हो जाना ॥ २७—३२ ॥ (विरोचमानं वपुषा दिव्याभरणभूषितम् । अनाद्यन्तमजं शम्भुं सर्वव्यापिनमीश्वरम् ॥ निस्त्रैगुण्यं निरुद्वेगं निर्मलं निधिमोजसाम् । प्रणम्य प्राञ्जलिः शर्वं प्रयामि शरणं हरम् ॥ (और इस प्रकार स्तुति करना)—जो अपने तेजस्वी श्रीविग्रहसे प्रकाशित हो रहे हैं, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं, आदि-अन्तसे रहित, अजन्मा, शम्भु, सर्वव्यापी, ईश्वर, त्रिगुणरहित, उद्वेगशून्य, निर्मल, ओज एवं तेजकी निधि एवं सबके पाप और दुःखको हर लेनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको हाथ जोड़ प्रणाम करके मैं उनकी शरणमें जाता हूँ ॥ सम्मान्यं निश्चलं नित्यमकारणमलेपनम् । अध्यात्मवेदमासाद्य प्रयामि शरणं मुहुः ॥ जो सम्माननीय, निश्चल, नित्य, कारणरहित, निर्लेप और अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता हैं, उन भगवान् शिवके निकट पहुँचकर मैं बारंबार उन्हींकी शरणमें जाता हूँ ॥ यस्य नित्यं विदुः स्थानं मोक्षमध्यात्मचिन्तकाः । योगिनस्तत्त्वमार्गस्थाः कैवल्यं पदमक्षरम् ॥ यं विदुः सङ्गनिर्मुक्ताः सामान्यं समदर्शिनः । तं प्रपद्ये जगद्योनिमयोनिं निर्गुणात्मकम् ॥ अध्यात्मतत्त्वका विचार करनेवाले ज्ञानी पुरुष मोक्षतत्त्वमें जिनकी स्थिति मानते हैं तथा तत्त्वमार्गमें परिनिष्ठित योगीजन अविनाशी कैवल्य पदको जिनका स्वरूप समझते हैं और आसक्तिशून्य समदर्शी महात्मा जिन्हें सर्वत्र समानरूपसे स्थित समझते हैं, उन योनिरहित जगत्कारणभूत निर्गुण परमात्मा शिवकी मैं शरण लेता हूँ ॥ असृजद् यस्तु भूरादीन् सप्तलोकान् सनातनान् । स्थितः सत्योपरि स्थाणुं तं प्रपद्ये सनातनम् ॥ जिन्होंने सत्यलोकके ऊपर स्थित होकर भू आदि सात सनातन लोकोंकी सृष्टि की है, उन स्थाणुरूप सनातन शिवकी मैं शरण लेता हूँ ॥ भक्तानां सुलभं तं हि दुर्लभं दूरपातिनाम् । अदूरस्थममुं देवं प्रकृतेः परतः स्थितम् ॥ नमामि सर्वलोकस्थं व्रजामि शरणं शिवम् ।) जो भक्तोंके लिये सुलभ और दूर (विमुख) रहनेवाले लोगोंके लिये दुर्लभ हैं, जो सबके निकट और प्रकृतिसे परे विराजमान हैं, उन सर्वलोकव्यापी महादेव शिवको मैं नमस्कार करता और उनकी शरण लेता हूँ ॥