महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1823, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
तपस्याका प्रभाव, आत्माका स्वरूप और उसके ज्ञानकी महिमा तथा अनुगीताका उपसंहार
ब्रह्मोवाच
भूतानामथ पञ्चानां यथैषामीश्वरं मनः।
नियमे च विसर्गे च भूतात्मा मन एव च॥ १॥
**ब्रह्माजीने कहा—**महर्षियो! जिस प्रकार इन पाँचों महाभूतोंकी उत्पत्ति और नियमन करनेमें मन समर्थ है, उसी प्रकार स्थितिकालमें भी मन ही भूतोंका आत्मा है॥ १॥
अधिष्ठाता मनो नित्यं भूतानां महतां तथा।
बुद्धिरैश्वर्यमाचष्टे क्षेत्रज्ञश्च स उच्यते॥ २॥
उन पञ्चमहाभूतोंका नित्य आधार भी मन ही है। बुद्धि जिसके ऐश्वर्यको प्रकाशित करती है, वह क्षेत्रज्ञ कहा जाता है॥ २॥
इन्द्रियाणि मनो युङ्क्ते सदश्वानिव सारथिः।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः क्षेत्रज्ञे युज्यते सदा॥ ३॥
जैसे सारथि अच्छे घोड़ोंको अपने काबूमें रखता है, उसी प्रकार मन सम्पूर्ण इन्द्रियोंपर शासन करता है। इन्द्रिय, मन और बुद्धि—ये सदा क्षेत्रज्ञके साथ संयुक्त रहते हैं॥ ३॥
महदश्वसमायुक्तं बुद्धिसंयमनं रथम्।
समारुह्य स भूतात्मा समन्तात् परिधावति॥ ४॥
जिसमें इन्द्रियरूपी घोड़े जुते हुए हैं, जिसका बुद्धिरूपी सारथिके द्वारा नियन्त्रण हो रहा है, उस देहरूपी रथपर सवार होकर वह भूतात्मा (क्षेत्रज्ञ) चारों ओर दौड़ लगाता रहता है॥ ४॥
इन्द्रियग्रामसंयुक्तो मनःसारथिरेव च।
बुद्धिसंयमनो नित्यं महान् ब्रह्ममयो रथः॥ ५॥
ब्रह्ममय रथ सदा रहनेवाला और महान् है, इन्द्रियाँ उसके घोड़े, मन सारथि और बुद्धि चाबुक है॥ ५॥
एवं यो वेत्ति विद्वान् वै सदा ब्रह्ममयं रथम्।
स धीरः सर्वभूतेषु न मोहमधिगच्छति॥ ६॥
इस प्रकार जो विद्वान् इस ब्रह्ममय रथकी सदा जानकारी रखता है, वह समस्त प्राणियोंमें धीर है और कभी मोहमें नहीं पड़ता॥ ६॥
अव्यक्तादि विशेषान्तं सहस्थावरजङ्गमम्।