भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1867, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1867

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अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना

वैशम्पायन उवाच

स मित्रसहमासाद्य अभिज्ञानमयाचत ।
तस्मै ददावभिज्ञानं स चेक्ष्वाकुवरस्तदा ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! रानी मदयन्तीकी बात सुनकर उत्तंकने महाराज मित्रसह (सौदास)-के पास जाकर उनसे कोई पहचान माँगी। तब इक्ष्वाकुवंशियोंमें श्रेष्ठ उन नरेशने पहचानके रूपमें रानीको सुनानेके लिये निम्नांकित सन्देश दिया ॥ १ ॥

सौदास उवाच

न चैवैषा गतिः क्षेम्या न चान्या विद्यते गतिः ।
एतन्मे मतमाज्ञाय प्रयच्छ मणिकुण्डले ॥ २ ॥

सौदास बोले— प्रिये! मैं जिस दुर्गतिमें पड़ा हूँ, यह मेरे लिये कल्याण करनेवाली नहीं है तथा इसके सिवा अब दूसरी कोई भी गति नहीं है। मेरे इस विचारको जानकर तुम अपने दोनों मणिमय कुण्डल इन ब्राह्मणदेवताको दे डालो ॥ २ ॥

इत्युक्तस्तामुत्तङ्कस्तु भर्तुर्वाक्यमथाब्रवीत् ।
श्रुत्वा च सा तदा प्रादात् ततस्ते मणिकुण्डले ॥ ३ ॥

राजाके ऐसा कहनेपर उत्तंकने रानीके पास जाकर पतिकी कही हुई बात ज्यों-की-त्यों दोहरा दी। महारानी मदयन्तीने स्वामीका वचन सुनकर उसी समय अपने मणिमय कुण्डल उत्तंक मुनिको दे दिये ॥ ३ ॥

अवाप्य कुण्डले ते तु राजानं पुनरब्रवीत् ।
किमेतद् गुह्यवचनं श्रोतुमिच्छामि पार्थिव ॥ ४ ॥

उन कुण्डलोंको पाकर उत्तंक मुनि पुनः राजाके पास आये और इस प्रकार बोले—‘पृथ्वीनाथ! आपके गूढ़ वचनका क्या अभिप्राय था, यह मैं सुनना चाहता हूँ’ ॥ ४ ॥

सौदास उवाच

प्रजानिसर्गाद् विप्रान् वै क्षत्रियाः पूजयन्ति ह ।
विप्रेभ्यश्चापि बहवो दोषाः प्रादुर्भवन्ति वै ॥ ५ ॥