भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1869, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1869

प्राहुर्वाक्संयतं विप्रं धर्मनैपुणदर्शिनः ।
मित्रेषु यश्च विषमः स्तेन इत्येव तं विदुः ॥ १२ ॥
उत्तंकने कहा— राजन्! धर्मनिपुण विद्वानोंने उसीको ब्राह्मण कहा है, जो अपनी वाणीका संयम करता हो—सत्यवादी हो। जो मित्रोंके साथ विषमताका व्यवहार करता है, उसे चोर माना गया है ॥ १२ ॥
स भवान् मित्रतामद्य सम्प्राप्तो मम पार्थिव ।
स मे बुद्धिं प्रयच्छस्व सम्मतां पुरुषर्षभ ॥ १३ ॥
पृथ्वीनाथ! पुरुषप्रवर! आज आपके साथ मेरी मित्रता हो गयी है, इसलिये आप मुझे अच्छी सलाह दीजिये ॥ १३ ॥
अवाप्तार्थोऽहमद्येह भवांश्च पुरुषादकः ।
भवत्सकाशमागन्तुं क्षमं मम न वेति वै ॥ १४ ॥
आज यहाँ मेरा मनोरथ सफल हो गया है और आप नरभक्षी राक्षस हो गये हैं। ऐसी दशामें आपके पास मेरा फिर लौटकर आना उचित है या नहीं ॥ १४ ॥

सौदास उवाच

क्षमं चेदिह वक्तव्यं तव द्विजवरोत्तम ।
मत्समीपं द्विजश्रेष्ठ नागन्तव्यं कथंचन ॥ १५ ॥
सौदासने कहा— द्विजश्रेष्ठ! यदि यहाँ मुझे उचित बात कहनी है, तब तो मैं यही कहूँगा कि ब्राह्मणोत्तम! आपको मेरे पास किसी तरह नहीं आना चाहिये ॥ १५ ॥
एवं तव प्रपश्यामि श्रेयो भृगुकुलोद्वह ।
आगच्छतो हि ते विप्र भवेन्मृत्युर्न संशयः ॥ १६ ॥
भृगुकुलभूषण विप्र! ऐसा करनेमें ही मैं आपकी भलाई देखता हूँ। यदि आयेंगे तो आपकी मृत्यु हो जायगी। इसमें संशय नहीं है ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तः स तदा राज्ञा क्षमं बुद्धिमता हितम् ।
अनुज्ञाप्य स राजानमहल्यां प्रतिजग्मिवान् ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार बुद्धिमान् राजा सौदासके मुखसे उचित और हितकी बात सुनकर उनकी आज्ञा ले उत्तंक मुनि अहल्याके पास चल दिये ॥ १७ ॥
गृहीत्वा कुण्डले दिव्ये गुरुपत्न्याः प्रियंकरः ।
जवेन महता प्रायाद् गौतमस्याश्रमं प्रति ॥ १८ ॥
गुरुपत्नीका प्रिय करनेवाले उत्तंक दोनों दिव्य कुण्डल लेकर बड़े वेगसे गौतमके आश्रमकी ओर बढ़े ॥ १८ ॥