भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1876, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1876

न प्रकाशन्त वेश्मानि धूमरुद्धानि भारत । नीहारसंवृतानीव वनानि गिरयस्तथा ॥ ५२ ॥ जनमेजय! ऐरावतके सारे घरमें हाहाकार मच गया। भारत! वासुकि आदि नागोंके घर धूमसे आच्छादित हो गये। उनमें अँधेरा छा गया। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो कुहासासे ढके हुए वन और पर्वत हों ॥ ५१-५२ ॥

ते धूमरक्तनयना वह्नितेजोऽभितापिताः । आजग्मुर्निश्चयं ज्ञातुं भार्गवस्य महात्मनः ॥ ५३ ॥ धुआँ लगनेसे नागोंकी आँखें लाल हो गयी थीं। वे आगकी आँचसे तप रहे थे। महात्मा भार्गव (उत्तंक)-का क्या निश्चय है, यह जाननेके लिये सभी एकत्र होकर उनके पास आये ॥ ५३ ॥

श्रुत्वा च निश्चयं तस्य महर्षेरतितेजसः । सम्भ्रान्तनयनाः सर्वे पूजां चक्रुर्यथाविधि ॥ ५४ ॥ उस समय उन अत्यन्त तेजस्वी महर्षिका निश्चय सुनकर सबकी आँखें भयसे कातर हो गयीं तथा सबने उनका विधिवत् पूजन किया ॥ ५४ ॥

सर्वे प्राञ्जलयो नागा वृद्धबालपुरोगमाः । शिरोभिः प्रणिपत्योचुः प्रसीद भगवन्निति ॥ ५५ ॥ अन्तमें सभी नाग बूढ़े और बालकोंको आगे करके हाथ जोड़, मस्तक झुका प्रणाम करके बोले—'भगवन्! हमपर प्रसन्न हो जाइये' ॥ ५५ ॥

प्रसाद्य ब्राह्मणं ते तु पाद्यमर्घ्यं निवेद्य च । प्रायच्छन् कुण्डले दिव्ये पन्नगाः परमार्चिते ॥ ५६ ॥ इस प्रकार ब्राह्मण देवताको प्रसन्न करके नागोंने उन्हें पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया और वे दोनों परम पूजित दिव्य कुण्डल भी वापस कर दिये ॥ ५६ ॥