महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1893, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपितरं दुःखिततरो गोविन्दो वाक्यमब्रवीत् ।
इस प्रकार पिताको अत्यन्त दुःखित होकर बहुत विलाप करते देख श्रीकृष्ण स्वयं भी बहुत दुःखी हो गये और उन्हें सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले— ॥ १५ १/२ ॥
न तेन विकृतं वक्त्रं कृतं संग्राममूर्धनि ॥ १६ ॥
न पृष्ठतः कृतश्चापि संग्रामस्तेन दुस्तरः ।
'पिताजी! अभिमन्युने संग्राममें आगे रहकर शत्रुओंका सामना किया। उसने कभी भी अपना मुख विकृत नहीं किया। उस दुस्तर युद्धमें उसने कभी पीठ नहीं दिखायी ॥ १६ १/२ ॥
निहत्य पृथिवीपालान् सहस्रशतसंघशः ॥ १७ ॥
खेदितो द्रोणकर्णाभ्यां दौःशासनिवशं गतः ।
'लाखों राजाओंके समूहोंको मारकर द्रोण और कर्णके साथ युद्ध करते-करते जब वह बहुत थक गया, उस समय दुःशासनके पुत्रके द्वारा मारा गया ॥ १७ १/२ ॥
एको ह्येकेन सततं युध्यमाने यदि प्रभो ॥ १८ ॥
न स शक्येत संग्रामे निहन्तुमपि वज्रिणा ।
'प्रभो! यदि निरन्तर उसे एक-एक वीरके साथ ही युद्ध करना पड़ता तो रणभूमिमें वज्रधारी इन्द्र भी उसे नहीं मार सकते थे (परन्तु वहाँ तो बात ही दूसरी हो गयी) ॥ १८ १/२ ॥
समाहृते च संग्रामात् पार्थे संशप्तकैस्तदा ॥ १९ ॥
पर्यवार्यत संक्रुद्धैः स द्रोणादिभिराहवे ।
'अर्जुन संशप्तकोंके साथ युद्ध करते हुए संग्राम-भूमिसे बहुत दूर हट गये थे। इस अवसरसे लाभ उठाकर क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्य आदि कई वीरोंने मिलकर उस बालकको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १९ १/२ ॥
ततः शत्रुवधं कृत्वा सुमहान्तं रणे पितः ॥ २० ॥
दौहित्रस्तव वार्ष्णेय दौःशासनिवशं गतः ।
'वृष्णिकुल भूषण पिताजी! तो भी शत्रुओंका बड़ा भारी संहार करके आपका वह दौहित्र युद्धमें दुःशासन-कुमारके अधीन हुआ ॥ २० १/२ ॥
नूनं च स गतः स्वर्गं जहि शोकं महामते ॥ २१ ॥
न हि व्यसनमासाद्य सीदन्ति कृतबुद्धयः ।
'महामते! अभिमन्यु निश्चय ही स्वर्गलोकमें गया है; अतः आप उसके लिये शोक न कीजिये। पवित्र बुद्धिवाले साधु पुरुष संकटमें पड़नेपर भी इतने खिन्न नहीं होते हैं ॥ २१ १/२ ॥
द्रोणकर्णप्रभृतयो येन प्रतिसमासिताः ॥ २२ ॥
रणे महेन्द्रप्रतिमाः स कथं नाप्नुयाद् दिवम् ।