महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1894, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘जिसने इन्द्रके समान पराक्रमी द्रोण, कर्ण आदि वीरोंका युद्धमें डटकर सामना किया है, उसे स्वर्गकी प्राप्ति कैसे नहीं होगी? ।। २२ १/२ ।।
स शोकं जहि दुर्धर्ष मा च मन्युवशं गमः ।। २३ ।।
शस्त्रपूतां हि स गतिं गतः परपुरंजयः ।
‘दुर्धर्ष वीर पिताजी! इसलिये आप शोक त्याग दीजिये! शोकके वशीभूत न होइये। शत्रुओंके नगरपर विजय पानेवाला वीरवर अभिमन्यु शस्त्राघातसे पवित्र हो उत्तम गतिको प्राप्त हुआ है ।। २३ १/२ ।।
तस्मिंस्तु निहते वीरे सुभद्रेयं स्वसा मम ।। २४ ।।
दुःखार्ताथो सुतं प्राप्य कुररीव ननाद ह ।
द्रौपदीं च समासाद्य पर्यपृच्छत दुःखिता ।। २५ ।।
आर्ये क्व दारकाः सर्वे द्रष्टुमिच्छामि तानहम् ।
‘उस वीरके मारे जानेपर मेरी यह बहिन सुभद्रा दुःखसे आतुर हो पुत्रके पास जाकर कुररीकी भाँति विलाप करने लगी और द्रौपदीके पास जाकर दुःखमग्न हो पूछने लगी—‘आर्ये! सब बच्चे कहाँ हैं? मैं उन सबको देखना चाहती हूँ’ ।। २४-२५ १/२ ।।
अस्यास्तु वचनं श्रुत्वा सर्वास्ताः कुरुयोषितः ।। २६ ।।
भुजाभ्यां परिगृह्यैनां चुक्रुशुः परमार्तवत् ।। २७ ।।
‘इसकी बात सुनकर कुरुकुलकी सारी स्त्रियाँ इसे दोनों हाथोंसे पकड़कर अत्यन्त आर्त-सी होकर करुण विलाप करने लगीं ।। २६-२७ ।।
उत्तरां चाब्रवीद् भद्रे भर्ता स क्व नु ते गतः ।
क्षिप्रमागमनं मह्यं तस्य त्वं वेदयस्व ह ।। २८ ।।
‘सुभद्राने उत्तरासे भी पूछा—‘भद्रे! तुम्हारा पति वह अभिमन्यु कहाँ चला गया? तुम शीघ्र उसे मेरे आगमनकी सूचना दो ।। २८ ।।
ननु नामाद्य वैराटि श्रुत्वा मम गिरं सदा ।
भवनान्निष्पतत्याशु कस्मान्नाभ्येति ते पतिः ।। २९ ।।
‘विराटकुमारी! जो सदा मेरी आवाज सुनकर शीघ्र घरसे निकल पड़ता था, वही तुम्हारा पति आज मेरे पास क्यों नहीं आता है? ।। २९ ।।
अभिमन्यो कुशलिनो मातुलास्ते महारथाः ।
कुशलं चाब्रुवन् सर्वे त्वां युयुत्सुमिहागतम् ।। ३० ।।
‘अभिमन्यो! तुम्हारे सभी महारथी मामा सकुशल हैं और युद्धकी इच्छासे यहाँ आये हुए तुमसे उन सबने तुम्हारा कुशल-समाचार पूछा है ।। ३० ।।
आचक्ष्व मेऽद्य संग्रामं यथापूर्वमरिंदम ।
कस्मादेवं विलपतीं नाद्येह प्रतिभाषसे ।। ३१ ।।