भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1895, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1895

'शत्रुदमन! पहलेकी भाँति आज भी तुम मुझे युद्धकी बात बताओ। मैं इस प्रकार विलाप करती हूँ तो भी आज यहाँ तुम मुझसे बात क्यों नहीं करते हो?' ॥ ३१ ॥ एवमादि तु वार्ष्णेय्यास्तस्यास्तत्परिदेवितम् । श्रुत्वा पृथा सुदुःखार्ता शनैर्वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ३२ ॥ सुभद्रे वासुदेवेन तथा सात्यकिना रणे । पित्रा च लालितो बालः स हतः कालधर्मणा ॥ ३३ ॥ ‘सुभद्राका इस प्रकार विलाप सुनकर अत्यन्त दुःखसे आतुर हुई बुआ कुन्तीने शनैः-शनैः उसे समझाते हुए कहा—'सुभद्रे! वासुदेव, सात्यकि और पिता अर्जुन—तीनों जिसका बहुत लाड़-प्यार करते थे, वह बालक अभिमन्यु कालधर्मसे मारा गया है (उसकी आयु पूरी हो गयी, इसलिये मृत्युके अधीन हुआ है) ॥ ३२-३३ ॥ ईदृशो मर्त्यधर्मोऽयं मा शुचो यदुनन्दिनि । पुत्रो हि तव दुर्धर्षः सम्प्राप्तः परमां गतिम् ॥ ३४ ॥ ‘यदुनन्दिनि! मृत्युलोकमें जन्म लेनेवाले मनुष्योंका धर्म ही ऐसा है—उन्हें एक-न-एक दिन मृत्युके वशमें होना ही पड़ता है, इसलिये शोक न करो। तुम्हारा दुर्जय पुत्र परम गतिको प्राप्त हुआ है ॥ ३४ ॥ कुले महति जातासि क्षत्रियाणां महात्मनाम् । मा शुचश्चपलाक्षं त्वं पद्मपत्रनिभेक्षणे ॥ ३५ ॥ “बेटी! कमलदललोचने! तुम महात्मा क्षत्रियोंके महान् कुलमें उत्पन्न हुई हो; अतः तुम अपने चंचल नेत्रोंवाले पुत्रके लिये शोक न करो ॥ ३५ ॥ उत्तरां त्वमवेक्षस्व गुर्विणीं मा शुचः शुभे । पुत्रमेषा हि तस्याशु जनयिष्यति भाविनी ॥ ३६ ॥ “शुभे! तुम्हारी बहू उत्तरा गर्भवती है, तुम उसीकी ओर देखो, शोक न करो। वह भाविनी उत्तरा शीघ्र ही अभिमन्युके पुत्रको जन्म देगी” ॥ ३६ ॥ एवमाश्वासयित्वैनां कुन्ती यदुकुलोद्वह । विहाय शोकं दुर्धर्षं श्राद्धमस्य ह्यकल्पयत् ॥ ३७ ॥ ‘यदुकुलभूषण पिताजी! इस प्रकार सुभद्राको समझा-बुझाकर दुस्तर शोकको त्यागकर कुन्तीने उसके श्राद्धकी तैयारी करायी ॥ ३७ ॥ समनुज्ञाप्य धर्मज्ञं राजानं भीममेव च । यमौ यमोपमौ चैव ददौ दानान्यनेक rush? दानान्यनेकशः ॥ ३८ ॥ ‘धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिर और भीमसेनको आदेश देकर तथा यमके समान पराक्रमी नकुल-सहदेवको भी आज्ञा देकर कुन्तीदेवीने अभिमन्युके उद्देश्यसे अनेक प्रकारके दान दिलाये ॥ ३८ ॥ ततः प्रदाय बह्वीर्गा ब्राह्मणाय यदूद्वह ।

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 1895, कुल 2566 में से · BharatKosha